रविवार, 8 मार्च 2020

*२. स्मरण का अंग ~ १३३/१३६*


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ १३३/१३६*
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जगजीवन जंजाल सब, कहा६ कीजै विस्तार ।
रांम नांम तत सुमिरिये, येही अक्षर सार७ ॥१३३॥
(६. कहा-क्या) (७ . अक्षर सार-उपदेश का मूल संक्षेप)
संत कहते हैं कि सब व्यर्थ का प्रयास है इसे बड़ा कर कर क्या करेंगे। राम नाम ही त्तत्व है यह ही सार्थक शब्द भजन योग्य है। राम नाम के अलावा सब निरर्थक जंजाल है ।
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रांम नांम मंहि देखि मन, ज्यौं कहै त्यौं राखि ।
जगजीवन अविगति सुमरि, सुरतें हरि रस चाषि ॥१३४॥
संत जगजीवन जी कह रहै हैं कि मन में राम नाम के दर्शन हों और वहां से जो आज्ञा मिले वैसा ही आचरण हो और अपरम्पार राम का स्मरण हो और ध्यान में उस आनंद रस का आस्वादन हो।
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रांम नांम मंहि जे रहैं, तिनका अषल८ सरीर।
कहि जगजीवन देखि मन, ध्रू९ प्रहलाद कबीर ॥१३५॥
{८. अषल-अकल(अविनाशी)} (९. ध्रू-ध्रुव नामक भक्त)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो राम स्मरण में रहते हैं वे ही अमर हैं जैसे ध्रुव जी प्रहलाद जी व कबीर साहेब आज भी जन प्रिय हैं।
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जे कथणी प्रहलाद की, ध्रूव नारद की साख ।
कबीर नांमा१ कहि गये, जगजीवन सो भाखि ॥१३६॥
(१.नांमा-१. भगवान् के नाम; या २. नामदेव सन्त)
संत कहते हैं कि जो सत्य प्रहलाद जी ने कहा ध्रुव व नारद जिसके साक्षी रहे और कबीर जी व नामदेवजी ने भी जिसको कहा संत जगजीवन भी वही कह रहे हैं।
(क्रमशः)

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