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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ १३७/१४०*
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दुनियां संचै माल धन, हम संचैं हरि नांम ।
जगजीवन जे आयसी, काल दुकाला२ काम ॥१३७॥
(२. काल दुकाला-दुष्काल-संकट के समय या समय-असमय)
संत कहते हैं कि दुनिया माल व धन का संग्रह करती है हम तो हरिनाम का संग्रह करते है जो हमारे अच्छे व बुरे समय में काम आयेगा ।अच्छे में तो सुख देगा व बुरे समय मे कष्ट काटेगा।
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सुमिरन संचै सुरति सौं, भरि भरि धरै शरीर ।
जगजीवन सो जानिये, धनवंता है धीर ॥१३८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो इस स्मरण रुपी धन का संचय करते है व इसे भर भर कर शरीर में रखते है वे ही धैर्यवान सच्चे वीर है।
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रांम नांम रस प्रेम का, हरि भजि गाडै३ खास ।
सो धनवंत छीजै नहीं, सु कहि जगजीवनदास ॥१३९॥
(३. गाडै-गड्ढा खोद कर दबा दे)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि राम नाम रुपी रस को जो जन हृदय में दबा के अतंस तक रखते हैं वे धनवान कभी भी क्षीणता को प्राप्त नहीं होते ।
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जगजीवन इस जीव कूं, हरि धन की अति प्यास ।
क्रिपा तुम्हारी रांमजी, कछु इक पावै दास ॥१४०॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि इस जीव को हरि स्मरण की बहुत चाह है। अगर प्रभु जी आप कृपा करें तो यह दास भी कुछ लाभान्वित हो।
(क्रमशः)

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