रविवार, 8 मार्च 2020

*२. स्मरण का अंग ~ १२९/१३२*


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ १२९/१३२*
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रांम नांम चित्त आंनिये, ज्यूं चित्त निरमल होइ ।
जगजीवन क्रम-कालिमा३, हरि सुमिरन सूं धोइ ॥१२९॥
{३. क्रम कालिमां-कर्म कालिमा = दुष्कृत पाप कर्मों का कलंक(धब्बा)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि चित्त राम नाम चिंतन में रखें जिससे चित्त वृति निर्मल हो और कर्म जनित पाप हरि स्मरण से मिट जावें।
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सब सुमिरन सब कुछ सुनै, अविगत परस अलेख।
कहि जगजीवन मांहि मन, रांम भगति की रेख४ ॥१३०॥
{४. रेख-रेखा = सीमा(मर्यादा)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जितना भी भजन करते हो वह सब प्रभु सुनते हैं, वे बुद्धि से जाने जानेवाले स्पर्श से परे व वर्णनातीत हैं. जीव मन में ही ऐसे ईश्वर को जानते हुए भक्ति की मर्यादा में रहकर भजन करें।
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जगजीवन गुन गाइये, भजिये निरभै नांम ।
वाणी विमल बिचारिये, तो ह्रिदै बिराजै रांम ॥१३१॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि प्रभु के गुण निर्भय स्मरण करते हुये करें और वाणी विकार रहित हो तो निश्चय ही ह्रदय में प्रभु का निवास होता है।
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भूलि न रहिये बिषै५ में, भजिये रांम निवास ।
भगति अखंडित कीजिये, सु कहि जगजीवनदास ॥१३२॥
(५. बिषै-विषय = भोगवासना)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि कभी भी विषय विकार में न फंसें, हृदय में रहनेवाले ईश्वर का ध्यान करते रहें, व निरंतर भक्ति करें ऐसा संतों का मत है।
(क्रमशः)


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