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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२०४ - निजस्थान निर्णय । झपताल
मध्य नैन निरखूँ सदा, सो सहज स्वरूप ।
देखत ही मन मोहिया, है सो तत्व अनूप ॥टेक॥
त्रिवेणी तट पाइया, मूरति अविनाशी ।
जुग जुग मेरा भावता, सोई सुख राशी ॥१॥
तारूणी१ तट देख हूं, तहां सुस्थाना ।
सेवक स्वामी संग रहे, बैठे भगवाना ॥२॥
निर्भय थान सुहात सो, तहं सेवग स्वामी ।
अनेक जतन कर पाइया, मैं अंतरजामी ॥३॥
तेज तार२ परमिति नहीं, ऐसा उजियारा ।
दादू पार न पाइये, सो स्वरूप संभारा ॥४॥
२०४ - २०५ में निज स्वरूप साक्षात्कार के स्थान पर निर्णय दे रहे हैं - जो सहज स्वरूप ब्रह्म है उसी को मैं भीतर के नेत्रों से सदा देखता हूं, उसे देखते ही मेरा मन उससे मोहित हो गया था । वह है ही अनुपम तत्व,
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जहां आज्ञा चक्र में इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना रूप गँगा, यमुना, सरस्वती नदियों का संगम है, उसके ब्रह्म ध्यान रूप तट पर अविनाशी ब्रह्म के स्वरूप का साक्षात्कार हुआ है, वही सुख - राशि प्रति युग में मुझे प्रिय लगता रहा है,
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उक्त तारक त्रिवेणी१ के ब्रह्म ध्यान तट पर देखता हूं । उसी ध्यान रूप स्थान में भगवान् विराजे हुये भासते हैं और वृत्ति रूप से सेवक भी स्वामी के संग ही रहता है ।
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जहां सेवक स्वामी एक होकर विराजते हैं, वह समाधि स्थान काल कर्मादि भय से रहित है और प्रिय लगता है, अनेक साधन रूप यत्न करके मैंने अन्तर्यामी प्रभु को प्राप्त किया है ।
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उनके स्वरूप तेज की किरणें२ असीम हैं, ऐसा प्रकाश भास रहा है कि उसका पार नहीं मिलता, उसी प्रभु स्वरूप का मैंने स्मरण किया है ।
(क्रमशः)

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