🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*माया मंदिर मीच का, तामैं पैठा धाइ ।*
*अंध भया सूझै नहीं, साध कहैं समझाइ ॥*
===================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
.
*शक्ति शिव शोध का अंग १०८*
.
ज्यों काय हिं छाया लगी, क्यों ही छूटे नाँहिं ।
त्यों रत्त विरक्त रज्जबा, दीसै माया माँहिं ॥९॥
जैसे शरीर के साथ छाया लगी रहती है, उसका साथ किसी प्रकार भी शरीर से नहीं छुटता, वैसे ही माया में अनुरक्त तथा विरक्त दोनों के ही पीछे माया लगी है, दोनों ही माया में निमग्न हुए भासते हैं ।
.
पाणी में प्रतिबिम्ब देखिये, नहीं तो दीसे नाँहिं ।
रज्जब जीव जीवे सु यूं, माया काया माँहिं ॥१०॥
जल में प्रतिबिम्ब देखा जाता है, जल नहीं हो तो नहीं दीखता, इसी प्रकार माया के कार्य काया में ही जीव जीवित भासता है, शरीर बिना नहीं भासता ।
.
.
शक्ति१ सलिल२ माहीं दर्शे, प्रतिबिम्ब हि परि प्राण ।
जल लग३ ह्वै नाँहीं नहीं, समझो संत सुजाण ॥११॥
जल२ में ही प्रतिबिम्ब दीखता है, वैसे ही माया१ में पड़ कर ही जीव भासता है, जल३ का सम्बन्ध नहीं हो तो प्रतिबिम्ब नहीं भासता, वैसे ही माया का सम्बन्ध नहीं हो तो जीव नहीं भासता । हे बुद्धिमान संतों, ऐसा ही समझो ।
.
शरीर सुखी ह्वै शक्ति मधि, औरै देय गरास ।
बिन माया घरि घरि फिरै, छाजन भोजन आस ॥१२॥
माया में रहने से शरीर सुखी रहता है और बिना माया वस्त्र-भोजन की आशा से घर घर फिरना पड़ता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें