रविवार, 8 मार्च 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी ।*
*जेती बाबा तैं कही, इन एक न मानी ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *दृढ़ता*
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एक कठिहारा काष्ठ की भारी लकड़ियाँ लेकर आ रहा था मार्ग में एक घोड़े को उसका सईस जबर्दस्ती दूध जलेबी खिला रहा था । कठिहारे ने मन में सोचा, मैं तो काष्ठ की भारियां ढोता हूँ तो भी मुझे पेट भर रोटी नहीं मिलती और इस घोड़े को सईस जबर्दस्ती दूध जलेबी खिला रहा है तो यह नहीं खाता । अच्छा, अब मैं भी तब ही खाऊँगा, जब कोई जबर्दस्ती मेरे मुख में देगा । 
पहाड़ की कन्दरा में जा बैठा, तीन दिन हो गये भूख से व्याकुल था किन्तु अपने निश्चय में दृढ़ रहा । चौथे दिन भगवान एक यात्री सेठ बने और अपने साथियों के साथ उसी जलाशय पर ठहरे भोजन तैयार हुआ । सेठ ने कहा - 'कोई अतिथि की खोज करो, अतिथि को जिमाकर जीमेंगे । 
खोज करने पर उपर्युक्त व्यक्ति मिला । उस के पास भोजन रखा, किन्तु वह खाता नहीं । तब सेठ ने यह कहकर कि ये अपने हाथ से नहीं खाते होंगे, तुम लोग मुँह खोलो, मैं खिलाता हूँ । नौकरों ने मुख खोल दिया, सेठ ने अपने हाथ मुख में ग्रास दिया कि वह हँस पड़ा और बोला - "भगवान पर दृढ़ निश्चय रखने पर क्या नहीं होता ?" सेठादिक सब अन्तर्ध्यान हो गये और भी ईश्वर भजन में ही लग गया ।
दृढ़ता से हो जात है, शीघ्र हि आशा पूर्ण ।
कठिहारे मुख में दिया, भोजन हरि ने तूण॥४६॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

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