रविवार, 8 मार्च 2020

*२. स्मरण का अंग ~ १२१/१२४*


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ १२१/१२४*
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पहु३ फाटी प्रीतम भजौ, प्रेम पिवौ परभाति४ ।
जगजीवन एही रटण, लियां रहौ दिन राति ॥१२१॥
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि सुबह होते ही प्रभात काल में प्रभु भजन करते रहें प्रभु भजन-प्रेमरस का पान करें । दिन रात यही रटना रटते रहो।
(३. पहु-प्रत्यूष=प्रातःकाल{ब्राह्म मुहूर्त})
(४. परभाति-प्रभात{ प्रातःकाल})
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कहि जगजीवन गगन के, हरि भज खुलै कपाट।
महल पधारन मिलन कूं, सहज पिछाणै बाट५ ॥१२२॥
संत कहते हैं कि अनंत गगन में प्रभु भजन के द्वार खुले हैं जहाँ प्रभु स्थित हैं उनसे मिलने को भजन रुपी द्वार से होकर उस महल में जाना है, अतः मार्ग की पहचान करले। (५. बाट-मार्ग{रास्ता})
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जगजीवन सुरती सदा, सेवि सुखी सब जांण ।
रांम ह्रिदै थैं बीसरै, (तो) तुझको हरि की आंण६ ॥१२३॥
संत कहते हैं कि ध्यान सदा प्रभु में लगा कर रखे उनके ध्यान से ही सब सुख होंगे उनकी हृदय से कदापि विस्मृति न हो, हे जीव तुझे परमात्मा की आन है, शपथ है। (६. आंण-आन=शपथ)
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अलख निरंजन नांम हरि, रांम नांम गोबिंद ।
भाषि नांम अविगति अकल, जगजीवन भरि ज्यंद७ ॥१२४॥
संत कहते हैं कि उस अलख निरंजन प्रभु का राम, गोविंद, हरि जो भी प्रभु नाम चित में आये वह जीवन भर गाते रहें। (७. भरि ज्यंद-जीवनपर्यन्त)
(क्रमशः)

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