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*जीवों माँही जीव रहै, ऐसा माया मोह ।*
*सांई सूधा सब गया, दादू नहीं अंदोह ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*शक्ति शिव शोध का अंग १०८*
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जीव ब्रह्म में सगुण निर्गुण, तब लग माया मान ।
रज्जब रज तज काढतों, एकमेक भिन्न जान ॥१७॥
जब तक जीव में सगुणता और ब्रह्म में निर्गुणता रूप में भासता है तब तक हृदय में माया की ही प्रधानता माननी चाहिये जब संतजन ज्ञानोपदेश द्वारा उक्त भेदरूप रज हृदय से निकालते हैं, तब माया रहित जीव-ब्रह्म एकमेव भासते हैं ।
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जीव ब्रह्म में तब लग माया, एकमेव भिन्न भेद सु पाया ।
ज्यों शून्य मांहि आभे नीर, सगुण रु निर्गुण होहि शरीर ॥१८॥
जैसे आकाश में बादल और जल के स्थूल - सूक्ष्म दो रूप भासते हैं, वैसे ही ब्रह्म में जीव के सगुण शरीर और निर्गुण रूप ये दो भेद भासते हैं तब तक माया ही है, माया के अभाव में भेद नहीं भासता । यह रहस्य हमने गुरु कृपा से जान लिया है ।
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पान फूल फल सब गये, तरु नर सूखे अंग ।
रज्जब गत जामण मरण, छाया माया संग ॥१९॥
वृक्ष सूखने पर उसकी छाया नहीं रहती तब पत्ते, पुष्प, और फलादि अंग भी सब नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही जीव के जन्म-मरण माया के साथ है, जब ज्ञान द्वारा अज्ञान रूप माया नष्ट हो जाती है तब जन्म-मरण भी नष्ट हो जाते हैं ।
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दीसे बाहर भीतर बैठी, जामण मरण सु आगे पैठी१ ।
माया जीव जीव सोइ माया, रज्जब छुटे न छुटे काया ॥२०॥
माया बाहर कनकादि रूप से और भीतर कल्पनारूप से स्थित है । जन्म-मरण से प्रथम ही वासना रूप से जीव में प्रविष्ठ१ हुई रहती है । माया में वही जीव है, जीव में वही माया है । शरीर तो छूट जाता है किन्तु माया नहीं छूटती ।
(क्रमशः)

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