🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १०. मन कौ अंग)
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*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
*दादू यहु मन बरजि बावरे, घट में राखि घेरि ।*
*मन हस्ती माता बहै, अंकुश दे दे फेरि ॥२॥*
हे साधक ! विषयों में लगे हुए इस मन को यम नियम ध्यान धारणा आदि साधनों द्वारा विषयों से हटाओ । यदि विषयों से हटाने पर भी यह मन इन्द्रियों द्वारा बाहर विषयों पर जाता है तो फिर अपने हृदय में निग्रह उपायों से घेर कर रोक दो । क्योंकि यह मन हाथी की तरह दुष्ट दुर्दान्त है । योगाभ्यास में कुशल गुरु के बताये हुए उपदेश रूपी युक्ति के विना और हितमित पवित्र भोजन के तथा यमनियम आदि साधनों के विना कोई भी इसको रोक नहीं सकता । जैसे दुष्ट हाथी को अंकुश के बिना कोई भी रोक नहीं सकता ।
यहाँ पर यह रहस्य है कि मन का निग्रह दो प्रकार से होता है क्रम और हठ से । जो यम नियमादि साधनों द्वारा रोका जाता है वह क्रम निग्रह कहलाता है और जो हठ करके रोका जाता है वह हठयोग कहलाता है । इस साखी में मन को जो हाथी की उपमा दी है उससे यह सिद्ध होता है कि वह क्रम से(उपायों) से ही रोका जाता है हठ से नहीं । क्योंकि उन्मत्त हाथी को कोई अपने बल से नहीं रोक सकता किन्तु अंकुश से तो दुर्बल भी रोक सकता है ।
जैसे चक्षु आदि इन्द्रियों को उनके गोलक को रोकने से वे रुक जाती हैं ऐसे मन का जो गोलक(स्थान) है उसको रोकने से मन नहीं रुकता । क्योंकि उसके गोलक को कोई भी नहीं रोक सकता । किञ्च गोलक(इन्द्रिय स्थान) के रोकने मात्र से इन्द्रियाँ रुक जाती हैं यह भी मूर्खों की भ्रान्ति ही है ।
गीता में कहा है- कि जो कर्मेन्द्रियों को रोक कर मन से विषयों का चिन्तन करता है वह दम्भी है । योगवासिष्ठ में भी कहा है कि-अनन्दित युक्तियों को विना मन नहीं रोका जा सकता, वे युक्तियाँ योगवासिष्ठ में बतलाई हैं कि-जो चित्त को हठ से रोकने का उपाय करते हैं वे मानो उन्मत्त हाथी की कमल के कोमल-कोमल तन्तुओं से बांधना चाहते हैं । अतः वे मुर्ख हैं । जैसे अंकुश के विना उन्मत्त हाथी वश में नहीं होता उसी तरह मन की अनिन्दित युक्तियों के विना वश में नहीं होता ।
वे युक्तियाँ वासिष्ठ में बतला रहे हैं- अध्यात्म विद्या साधु संगति वासना का त्याग और प्राणों का अवरोध । ये मन को जितने के लिये प्रबल युक्तियाँ हैं । इन युक्तियों को छोड़कर जो मन को हठ से रोकना चाहते हैं वे दीपक के विना काजल से अन्धकार को दूर करना चाहते हैं । गीता में भी मन को अभ्यास और वैराग्य आदि साधनों से जितने के लिये कहा है । योगशास्त्र में पातन्जल में अभ्यास और वैराग्य को ही मन जीतने का मुख्य साधन माना । हठ से नहीं ॥२॥
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*हस्ती छूटा मन फिरे, क्यों ही बँध्या न जाइ ।*
*बहुत महावत पच गये, दादू कछु न वशाइ ॥३॥*
जैसे खूंटे से खुला हुआ हाथी बलवान् महावतों से भी बांधा नहीं जा सकता ऐसे ही विषयवन में विचरने वाला मन विद्वानों द्वारा भी रोका नहीं जा सकता । क्योंकि वह अति चंचल है । योगवासिष्ठ में लिखा है कि चित्तरूपी यक्ष ने जिसको पकड़ लिया उसको न मित्र छुड़ा सकते न भाई बन्धु, न गुरु और मानव भी नहीं छुड़ा सकते । गीता में लिखा है कि हे कृष्ण यह मन बड़ा ही बलवान् और इन्द्रियों का मन्थन करने वाला होने से वायु की तरह इसका निग्रह करना अतिदुष्कर है ।
अर्थात्- वन में रहने वाले की हाथी तरह इस मन का रोकना(निर्वृत्तिक रूप) स्थित रहना कठिन ही है । जैसे आकाश में विचरण करने वाली वायु की चंचलता को रोकना कठिन है । इसका रहस्य यह है कि- ज्ञान होने पर भी प्रारब्ध कर्म को भोगनेवाले जीते हुए पुरुष के कर्तृत्व भोक्तृत्व सुख-दुःख रागद्वेषादि चित्त के धर्म बाधितानुवृत्ति से क्लेश को देने वाले हो जाते हैं । क्योंकि चैतन्य के अलावा जितने भी भाव पदार्थ हैं वे प्रतिक्षण परिणामशील है ।
अतः जैसे अग्नि से उष्णत्व धर्म को नहीं निकाल सकते वैसे ही चित्त में उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक धर्मों को चित्त से हटाया नहीं जा सकता । किञ्च ज्ञान और योग की अपेक्षा प्रारब्ध कर्म बलवान् होता है अतः योग के द्वारा भी अवश्य होने वाली चित्त की चंचलता को दूर नहीं किया जा सकता है । क्योंकि कर्म का फल जो सुख दुःखादि भोग है वह चित्त की सुखदुःखाकार वृत्ति के विना भोगा नहीं जा सकता । इसीलिये अविद्या और उसके कार्य सुखदुःखादिक को विनाश करने वाले तत्त्वज्ञान का भी प्रारब्ध कर्म प्रबल होने से बाधक बन जाता है । अतः मन का नियमन करने के लिये साधक को प्रबल उपाय करने चाहिये ।
(क्रमशः)

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