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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ १२५/१२८*
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रांम नांम अैसैं कहै, जैसैं कह्या कबीर।
जगजीवन यौं मिलि रहै, थिति पायाँ मन थीर ॥१२५॥
संत कहते हैं राम नाम की सही विधि वह है जो कबीर जी की रही है, जगजीवन दास जी कहते हैं कि यदि हम इस स्थिति को प्राप्त होंगे तो मन चित स्थिर रहेगा।
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रांम नांम कहि रांम कहि, रांम कह्याँ अति चैन ।
जगजीवन यौं मिलि रहै, ज्यौं जल मांहीं मीन ॥१२६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि राम नाम कहो, राम नाम कहने से चैन आराम मिलता है। ऐसे सुख मिलता है जैसे मछली को जल में सुख मिलता है।
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जगजीवन सब अंग मैं, उत्तम करणी कोंण।
रांम नांम सौं मिलि रहै, जैसैं पांणी लोंण१ ॥१२७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि भजन में और सबसे उत्तम विधि कौन सी है ? तो उत्तरार्थ कह रहे हैं कि प्रभु में विलय, राम नाम में विलय ऐसा हो, जैसे नमक का पानी में विलय होना हो।
(१. लोंण-लवण=नमक)
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जगजीवन तारण तिरण, तेरे संगि मुरारि ।
सोइ२ सुमर्यां सुख ऊपजै, गुण इंद्री मन मारि२ ॥१२८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे जीव तुझे पार उतारने वाले स्वयं प्रभु है जो तेरे संग है। मन व इन्द्रियों को ईश्वर की ओर मोड़ कर किए हुये स्मरण से ही सुख मिलता है। (२-२. तीनों गुण पाँचों इन्द्रिय एवं मन पर निग्रह कर उस भगवान का स्मरण करने से ही वास्तविक सुख की प्राप्ति हो सकती है)
(क्रमशः)

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