शुक्रवार, 6 मार्च 2020

*३४. भक्तिस्त्रोत उमड़ने से पहले*

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*साधू संगति पाइये, तब द्वन्द्वर दूर नशाइ ।*
*दादू बोहिथ बैस करि, डूँडे निकट न जाइ ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*३४. भक्तिस्त्रोत उमड़ने से पहले*
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तावत्कर्मणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।
मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते॥[१]
([१] वर्णाश्रम विहित कर्मो को तब तक करते ही रहना चाहिये जब तक उनके प्रति पूर्ण रूप से वैराग्य न हो जाये अथवा भगवान की कथा के श्रवण में जब तक पूर्ण रूप से दृढ़ भक्ति न हो जाये। तात्पर्य यह कि वर्णाश्रम विहित कर्मो के करने के दो ही हेतु हैं या तो उनके द्वारा वैराग्य उत्पन्न होकर ज्ञान हो और ज्ञान के द्वारा मुक्ति अथवा भगवान के कथा कीर्तन में दृढ़ श्रद्धा द्वारा रति हो जाये और रति से भक्ति की प्राप्ति हो। श्रीमद्भा. ११/२०/९)
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भक्ति तथा मुक्ति का प्रधान और मुख्य कारण कर्म ही है। निष्काम और सकाम-भेद से कर्म दो प्रकार का है। सकाम कर्म भुक्तिप्रद है। उससे भूः, भुवः और स्वर्ग- इन तीन ही लोकों के भोग प्राप्त हो सकते हैं और निष्काम कर्म के द्वारा आत्मशुद्धि होकर साधक भक्ति तथा मुक्ति का अधिकारी बनता है।
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जो हृदय-प्रधान साधक हैं उन्हें निष्काम कर्मों के करते रहने से साधु-महात्माओं में प्रीति उत्पन्न होती है। महात्माओं के अधिक संसर्ग में रहने से उन्हें भगवत-कथाओं में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। भगवत-कथाओं में श्रद्धा होने से भगवद्गुणों में रति हो जाती है। भगवद्गुणों में रति होने के बाद भक्ति उत्पन्न होती है, भक्ति ही अन्तिम साध्य वस्तु है, उसे ही पराकाष्ठा या परा गति कहते हैं।
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जो मस्तिष्क-प्रधान साधक होते हैं, उन्हें निष्काम कर्मों के द्वारा आत्मशुद्धि होकर भगवद्भक्ति प्राप्त होती है, फिर संसारी विषयों से वैराग्य होता है, वैराग्य से उन्हें ज्ञान की इच्छा उत्पन्न होती है और ज्ञान के द्वारा वे मुक्ति को प्राप्त कर सकते हैं। मुक्ति ही प्राणिमात्र का चरम लक्ष्य है। यही जीवों की एकमात्र साध्य वस्तु है। इसीलिये मुक्ति तथा भक्ति का प्रधान हेतु वर्णाश्रम विहित कर्म ही है।
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जब तक भगवत-कथाओं में पूर्णरूप से श्रद्धा उत्पन्न न हो जाय, बिना भगवत-कथा श्रवण किये चैन ही न पड़े अथवा जब तक संसारी विषयों से पूर्णरीत्या वैराग्य न हो जाय, चित्त सर्वदा इन संसारी भोगों से हटकर एकान्तवास के लिये लालायित न बना रहे तब तक सभी प्रकार के मनुष्यों को अपने-अपने अधिकारानुसार कर्तव्य-कर्मों को करते ही रहना चाहिये।
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जो श्रद्धा तथा वैराग्य के पूर्व ही अज्ञान के वशीभत होकर कर्मों का त्याग कर देते हैं, वे नारकीय जीव हैं, वे स्वयं कर्म-त्यागरूपी पाप के द्वारा अपने लिये न करके मार्ग को परिष्कृत करते हैं। ऐसे पुरुष न तो भक्त बन सकते हैं और न ज्ञानी, वे इस संसार-चक्र में ही पड़े घूमते रहते हैं। कुछ ऐसे भी नित्यभक्त वा जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं, जिन्हें फिर से कर्म करने की आवश्यकता नहीं होती, वे पहले से ही मुक्त अथवा भक्त होते हैं।
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शुक-सनकादि जन्म से ही मुक्त थे। नारदादि पहले से ही भक्त होकर उत्पन्न हुए, इनके लिये किसी प्रकार के विशेष कर्मों के अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं हुई। इनमें आरम्भ से ही वैराग्य तथा भक्ति विद्यमान थी। इसीलिये शुक-सनकादि आरम्भ से ही ज्ञानी बनकर स्वेच्छापूर्वक विचरण करते रहे और नारदादि सदा हरि-गुण गान करते हुए सभी लोकों को पावन बनाते फिरे। अतएव इनके लिये आरम्भ से ही कोई कर्तव्य-कर्म नहीं था।
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अब प्रश्न यह है कि भक्ति तथा मुक्ति में कौन-सी वस्तु श्रेष्ठ है? इनका उत्तर यही दिया जा सकता है कि या तो इनमें से कोई भी श्रेष्ठ नहीं या दोनों ही श्रेष्ठ हैं। ये दोनों ही स्थिति सनातन हैं, सदा से प्राणियों की ये ही दो परम स्थिति सुनी गयी हैं।
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वेद-शास्त्रों से ज्ञानी-महर्षियों ने इन्हीं दो स्थितियों का वर्णन किया है।
*‘तस्य तदेव मधुरं यस्य मनो यत्र संलग्नः’*
जिसके जो अनुकूल पड़े उसके लिये वही सर्वोत्तम है। हृदय और मस्तिष्क की ये दो ही शक्तियाँ हैं। जिसमें जिसकी प्रधानता होगी, उसको वही मार्ग रुचिकर होगा। दूसरे से उसे कोई प्रयोजन नहीं। वह तो अपने ही मार्ग को सर्वस्व समझेगा।
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अब यह प्रश्न उठता है कि बहुधा भक्तों को यह कहते सुना गया है कि ‘हम तो मुक्ति को अत्यन्त तुच्छ समझते हैं, भक्ति के बिना मुक्ति को हम तो ठुकरा देते हैं।’ इसके विपरीत ज्ञान-मार्ग के साधकों के द्वारा यह सुना गया है कि ‘मुक्ति ही मनुष्य का चरम लक्ष्य है, भक्ति उसका साधन भले ही हो किन्तु साध्य वस्तु तो मुक्ति ही है। मुक्ति के बिना परम शान्ति नहीं।’ इनमें से किसकी बात मानें? दो बातें तो ठीक हो नहीं सकतीं। फिर वे दो ऐसी बातें जो परस्पर में एक-दूसरे के विरुद्ध हों।
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यदि ध्यानपूर्वक इन दोनों बातों पर विचार किया जाय तो इन दोनों में कोई विरोध नहीं मालूम पड़ता। लोक में भी देखा जाता है कि जिस मनुष्य को जो वस्तु अत्यन्त प्रिय होती है, वह कहता है ‘मैं तो इससे बढ़कर त्रिलोकी में कोई वस्तु नहीं समझता।’ उसके कथन का अभिप्राय इतना ही है कि मुझे तो यही वस्तु अत्यन्त प्रिय है, मेरे लिये तो इससे बढ़कर कोई दूसरी वस्तु नहीं है। ‘नहीं’ कहने से उसका अभिप्राय अन्य वस्तुओं के ‘अभाव’ से न होकर ‘प्रिय’ से है।
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अर्थात मुझे इसके सिवा दूसरी वस्तु प्रिय नहीं है। उसका कथन एक प्रकार से ठीक भी है, जब तक उसकी उस वस्तु के प्रति अनन्यता न हो जायगी तब तक उसमें प्रीति कही ही नहीं जा सकती। इसी प्रकार भक्ति का मार्ग जिन्होंने ग्रहण किया है, उनके लिये ज्ञान के द्वारा मुक्ति प्राप्त करना कोई वस्तु ही नहीं है और जिन्होंने ज्ञान के मार्ग से जाने का दृढ़ निश्चय कर लिया है, उनके लिये किसी भी प्रकार के नाम-रूप का चिन्तन करना महान विघ्न है। ये हम साधारण लोगों के समझने के लिये साधारण-सी दलीलें हैं।
(क्रमशः)

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