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*साधु जन संसार में, भव - जल बोहित अंग ।*
*दादू केते उद्धरे, जेते बैठे संग ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*विद्यासागर*
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ जीने से चढ़कर पहले कमरे में(जो उत्तर की तरफ था) गए । कमरे में उत्तरी हिस्से में विद्यासागर दक्षिणाभिमुख बैठे हैं । सामने एक चौकोर लम्बी चिकनी मेज है । इसी के पास एक बेंच है । मेज के आसपास कुछ कुर्सियाँ हैं । विद्यासागर दो एक मित्रों से बातचीत कर रहे थे ।
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श्रीरामकृष्ण के प्रवेश करते ही विद्यासागर ने खड़े होकर उनका स्वागत किया । श्रीरामकृष्ण मेज के पूर्व की ओर खड़े हैं- बायाँ हाथ मेज पर है; पीछे वह बेंच है । विद्यासागर को पूर्वपरिचित की भाँति एकटक देखते हैं और भावावेश में हँसते हैं ।
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विद्यासागर की उम्र तिरसठ के लगभग होगी । श्रीरामकृष्ण से वे सोलह-सत्रह वर्षं बड़े होंगे । मोटी धोती पहने हुए हैं, पैरों में स्लीपर, और बदन में एक आधी आस्तीन का फलालैन का कुरता । सिर का निचला हिस्सा चारों तरफ उड़िया लोगों की तरह मुँड़ा हुआ है । बोलने के समय उज्जवल दाँत नजर आते हैं-सभी दाँत नकली हैं । सिर खूब बड़ा है, ललाट ऊँचा है और कद कुछ छोटा । ब्राह्मण हैं, इसलिए गले में जनेऊ है ।
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विद्यासागर में अनेक गुण हैं । पहला गुण-विद्यानुराग । एक दिन मास्टर से यह कहते हुए सचमुच ही रो पड़े थे कि मेरी तो तीव्र इच्छा थी कि खूब विद्या-अध्ययन करूँ, पर कुछ न हो सका; संसार में पड़ जाने के कारण बिलकुल समय नहीं मिला । दूसरा गुण-सर्व जीवों पर दया । विद्यासागर दया के सागर हैं । बछड़ों को माँ का दूध नहीं मिलता यह देखकर दूध पीना छोड़ ही दिया था; आखिर कई साल बाद स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने के कारण फिर दूध शुरू करना पड़ा था ।
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गाड़ी में नहीं चढ़ते थे-घोड़ा बेचारा अपना कष्ट जता नहीं सकता, चुपचाप सहता जाता है । एक दिन आपने देखा, एक बोझ ढोनेवाले हम्माल को हैजा हो गया है, वह रास्ते पर पड़ा हुआ है, पास ही उसकी टोकरी पड़ी है । देखते ही आप स्वयं उसे उठाकर अपने घर ले आए और उसकी सेवा शुश्रूषाकरने लगे । तीसरा गुण-स्वाधीनता प्रीति । अधिकारियों के साथ एकमत न होने के कारण संस्कृत कालेज के प्रधानाध्यापक(प्रिन्सिपल) का पद छोड़ दिया । चौथा गुण-लोगों की निन्दास्तुती की परवाह नहीं थी ।
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एक शिक्षक पर आपका स्नेह था, उनकी बेटी के विवाह के समय उसे उपहार देने के लिए नया वस्त्र बगल में दाबकर आ खड़े हुए । पाँचवाँ गुण-मातृभक्ति तथा मानसिक बल । माँ ने कहा था, ‘ईश्वर, तुम यदि इस विवाह में(भाई के विवाह में) नहीं आओगे तो मेरे मन में बड़ा दुःख होगा ।’ इसलिए कलकत्ते से पैदल ही निकल पड़े । राह में दामोदर नदी थी । नाव नहीं थी, -तैरकर ही उस पार चले गए । विवाह की रात्रि को गीले कपड़ों में माँ के सामने जा पहुँचे, कहा, ‘माँ, मैं आ गया ।’
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*विद्यासागर के साथ श्रीरामकृष्ण का वार्तालाप*
श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट हो रहे हैं और थोड़ी देर के लिए उसी दशा में खड़े हैं । भाव सम्हालने के लिए बीच बीच में कहते हैं कि पानी पीऊँगा । इस बीच में घर के लड़के और आत्मीय बन्धु भी आकर खड़े हो गए ।
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श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट होकर बेंच पर बैठते हैं । एक सत्रह-अठारह वर्ष का लड़का उस पर बैठा है-विद्यासागर के पास सहायता माँगने आया है । श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट हैं-ऋषि की अन्तर्दृष्टि लड़के के सब मनोभाव ताड़ गयी । आप कुछ सरककर बैठे और भावावेश में कहने लगे, “माँ इस लड़के की संसार में बड़ी आसक्ति है, और तुम्हारे अविद्या के संसार पर ! यह अविद्या का लड़का है ।” जो ब्रह्मविद्या के लिये व्याकुल नहीं है, केवल अर्थकरी विद्या का उपार्जन करना उसके लिये व्यर्थ है- कदाचित् आप यही कह रहे हैं ।
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विद्यासागर ने व्यग्र होकर किसी से पानी लाने को कहा और मास्टर से पूछा, “कुछ मिठाई लाऊँ, क्या ये खाएँगे?” मास्टर ने कहा, “जी हाँ, ले आईये ।” विद्यासागर जल्दी से भीतर जाकर कुछ मिठाइयाँ ले आए और कहा कि यह बर्दवान से आयी हैं । श्रीरामकृष्ण को कुछ खाने को दी गयी; हाजरा और भवनाथ ने भी कुछ पायी । जब मास्टर की बारी आयी तो विद्यासागर ने कहा, “वह तो घर ही का लड़का है, उसके लिए चिन्ता नहीं ।” श्रीरामकृष्ण एक भक्त लड़के के बारे में विद्यासागर से कह रहे हैं, जो सामने ही बैठा था । आपने कहा, “यह लड़का बड़ा अच्छा है, और इसके भीतर सार है, जैसे फल्गु नदी; ऊपर तो रेत है, पर थोड़ा खोदने से ही भीतर पानी बहता दिखायी देता है ।”
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मिठाई पा चुकने के बाद आप हँसते हुए विद्यासागर से बातचीत कर रहे हैं । देखते ही देखते कमरा दर्शकों से भर गया; कोई बैठा है, कोई खड़ा है ।
श्रीरामकृष्ण- आज सागर से आ मिला । इतने दिन खाई, सोता और अधिक से अधिक हुआ तो नदी देखी, पर अब सागर देख रहा हूँ ।(सब हँसते हैं ।)
विद्यासागर- तो थोड़ा खारा पानी लेते जाईये । (हास्य)
श्रीरामकृष्ण- नहीं तो, खारा पानी क्यों? तुम तो अविद्या के सागर नहीं, विद्या के सागर हो ! (सब हँसे ।) तुम क्षीरसमुद्र हो ! (सब हँसे ।)
विद्यासागर- आप जो चाहें कह सकते हैं ।
(क्रमशः)

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