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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १०. मन कौ अंग)
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*थोरे थोरे हठ किये, रहेगा ल्यौ लाइ ।*
*जब लागा उनमनि सौं, तब मन कहीं न जाइ ॥५॥*
वैराग्य की भावना से विषयों से उपरत हुआ मन फिर कभी विषयों में आसक्त होने लगे तो धैर्य के द्वारा बार-बार विषयों में दोष दिखाते हुए मन के द्वारा ही मन को चींटी की तरह धीरे-धीरे अतिप्रयत्नपूर्वक गुरु के बतालाये हुए मार्ग से उस मन की आत्मकारावृत्ति बनानी चाहिये । इस तरह अभ्यास करते हुए साधक का मन लय विक्षेप से रहित हो जायगा । तब ईन्धन रहित अग्नि की तरह स्वयं ही उन्मनी(उदासीनता) को प्राप्त होकर स्थिर हो जायेगा ।
गीता में- धीरे-धीरे अपने मन को धैर्यवती बुद्धि से उपराम बनाकर आत्मा में स्थित कर दें । फिर किसी का भी चिन्तन न करे । और भी कहा है कि- जब मन वासना रहित हो जाता है और किसी का भी मनन न करे तो समझना चाहिये कि अब परम गति को देने वाली मन की अमनस्कता पैदा हो गई है ।
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*आड़ा दे दे राम को, दादू राखै मन ।*
*साखी दे सुस्थिर करै, सोई साधू जन ॥६॥*
संपूर्ण प्राणियों के शरीर में सत्तास्फुर्ति देने वाला चैतन्यमात्र साक्षीस्वरूप परमात्मा हृदय में ही स्थित है । ऐसा जानकर उसके भय से दुर्वासना वाले मन को विषयों से रोकना चाहिये । अर्थात् वह परमात्मा मेरे कार्य अकार्य सारे कर्मों को देखता है । अतः वह अवश्य मुझे बुरे कर्मों के अनुसार फल देता हुआ नरक में डालेगा । वहाँ पर व्रज सदृश लम्बी चौंच वाले गीध, कंक, वक, वट आदि जीव मुझ पापी की आँखों को निकाल कर खायेंगे । व्रज के सदृश दाँत वाले कुत्ते मुझे काटेंगे । यमपुरुष तीखे-तीखे बाणों से प्रहार करेंगे । भूख, प्यास से दुःखी मुझको पर्वत की चोटियों से नीचे गिरायेंगे । उस अवस्था में जीर्णशीर्ण शरीर वाला मैं मरता हुआ पीप, मल, मूत्र, श्लेष्मा के समुद्र में अवश्य पटका जाऊंगा । इस तरह अपनी बुद्धि से विचार करते हुए वो अपने मन को विषयों से रोकता है वह ही सच्चा साधु है । लिखा है कि सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, ध्युलोक भूमि, आकाश, यम हृदय, दिन रात दोनों सन्ध्यायें धर्म ये सब मानव के कर्म को जानते हैं ।
अथवा “आडा दे दे राम को” इसका दूसरा भी भाव हो सकता है-
जैसे कोई व्यक्ति बलवान् राजा के सहारे डाकुओं को पकड़ लेता है और डाकू भी यह मानकर कि इसके तो राजा का सहारा है स्वयं ही उसके वश में हो जाते हैं । इसी प्रकार सर्वान्तर्यामी सर्व नियन्ता भगवान् के नाम के सहारे दुष्ट इन्द्रियों को रोकना चाहिये । फिर तो उसकी इन्द्रियाँ स्वयं ही यह जानकर कि, यह तो भगवान् के सहारे रहता है । इसका हम कुछ बिगाड़ नहीं सकते हैं । ऐसा जानकर स्वयं ही मन और इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं । क्योंकि भगवान् की भक्ति में महान् बल है ।
भागवत में लिखा है- यह मन बड़ा बलवान् है तथा हमारा वैरी है । उपेक्षा करने से यह बड़ा बलवान्(चंचल) बन जाता है । अतः सावधान होकर गुरु के चरणों की उपासना का बल प्राप्त करके इस मन को मार(जीत) डालो । यह आत्मा को चुराने वाला परम वैरी है ।
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*सोई शूर जे मन गहै, निमख न चलने देइ ।*
*जब ही दादू पग भरै, तब ही पकड़ि लेइ ॥७॥*
विषयों में जाते हुए अपने मन को जो साधक “यह सब क्षणिक है भगवान् का भजन ही कल्याण का देने वाला है” इस प्रकार समझाकर फिर भगवान् में ही लगा देता है क्षणभर भी विलम्ब नहीं करता । किन्तु अनासक्तमन से भगवान् का भजन नहीं करता है ऐसा साधक शूरवीर से भी अधिक शूरवीर है ।
शंकराचार्यजी लिखते हैं कि- शूरवीर से भी अधिक शूरवीर कौन है? जो कामक्रोधादि को के वेगों से कभी दुखी नहीं होता प्रत्युत उनसे लड़ता है वही शूरवीर कहलाता है । तथा हाथी-घोड़ों से भरपूर युद्धरूपी समुद्र को पार करने वाला शूरवीर नहीं होता किन्तु देह इन्द्रिय आदि विषयों में जाते हुए अपने मन को जीत लेता है वह ही शूरवीर है ।
कालिदासजी ने कहा है कि- मन को विकृत करने वाली सामग्री के होते हुए भी जिसका मन विकार को प्राप्त नहीं हो वे ही धीर पुरुष कहलाते हैं ।
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*जेती लहर समंद की, ते ते मनहि मनोरथ मार ।*
*बैसे सब संतोंष कर, गहि आत्म एक विचार ॥८॥*
इस लोक तथा परलोक की सभी विषयजन्य कामनाओं का जो अविचार से पैदा होती है तथा क्षणभंगुर है । ब्रह्मा जितनी लम्बी आयु प्राप्त होने पर भी उनका भोग समाप्त नहीं हो सकता । यह मुझे प्राप्त हो यह मुझे प्राप्त हो यह ही कामना का स्वरूप है । ये कामनायें समुद्र के तरंग की तरह अनन्त हैं । शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्म में माया के द्वारा कल्पित हैं । अतएव मिथ्याभूत इन सब कामनाओं का विचाररूपी सम्यक् आत्मज्ञान से नष्ट करके सच्चिदानन्द ब्रह्म में स्थित रहता हुआ इनका कभी चिन्तन न करे ।
गीता में- हे अर्जुन मन में पैदा होने वाली संपूर्ण कामनाओं को जब साधक त्याग देता है तथा अपनी आत्मा में आत्मा को स्थित करके संतुष्ट रहता है तो वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है । अतः संकल्प से पैदा होने वाली सारी कामनाओं को त्याग कर तथा अपने मन को आत्मा में स्थिर करके किसी भी अन्य का चिन्तन न करे ।
जो मानव सारी कामनाओं को त्यागकर निस्पृह ममतारहित अहंकाररहित विचरण करता है तो वह शान्ति को पाता है ।
वासिष्ठ में- हे ब्रह्मन् सम्यग्ज्ञान से वासना का नाश होने से मैं जीवन्मुक्त पद में स्थित रहता हुआ बिलकुल शान्त हूँ । उपनिषद् में- जिस समय हृदय में उत्पन्न होने वाली सारी कामनायें नष्ट हो जाती हैं तब साधक अमर हो जाता है । तथा ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ।
मुण्डक में लिखा है कि- जिसने कामना से रहित होकर ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया उसकी सारी कामना यहाँ ही विलीन हो जाती है ।
(क्रमशः)

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