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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ १०९/११२*
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जगजीवन हरि भजन करि, हरिजन पूजा होइ ।
कोइ इक जांणैं जौहरी, और न जांणैं कोइ ॥१०९॥
जगजीवन दास जी कहते हैं कि हरि का भजन ही हरि जी की पूजा है इस बात को कोइ पहचान वाला ही जानता है और कोइ नहीं जान पाता है।
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जगजीवन गोबिन्द गुण, निस बासुर उठि गाइ ।
परिहरि दूजी वासना, हरि भजि सुन्नि समाइ ॥११०॥
जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि गोविंद के गुण नित्य उठकर गाया करें और दूसरी सभी वासनाओं को त्याग कर निरंजन परमात्मा के शून्य सवरुप में ध्यानस्थ होवें।
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जिस घट माँही नांम है, सो क्यों घटै सरीर ।
अघट एकरस एक सौं, जगजीवन करि सीर५॥१११॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि जिस हृदय में राम है उसे धारण करने वाला शरीर कभी भी क्षीण नहीं होता क्योंकि उसके सारे आनंद ईश्वर से जुड़े होते है और ईश्वर कभी घटते नहीं हैं।
(५. सीर-स्वकीय सत्ता की स्थापना। या दूसरे के साथ किसी बात में एकता करना)
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रांम निरंजन अलख भजि, अविगत अपरंपार ।
कहि जगजीवन नांव भजि, सहजैं उतरै पार ॥११२॥
संत कहते हैं कि हे जीवात्मा उस निरंजन जो नेत्रों द्वारा दिखता नहीं जो पहुंच से परे व अपार है के नाम का स्मरण करने से सहज ही पार उतर जाओगे ऐसा जगजीवन दास जी कह रहै हैं।
(क्रमशः)

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