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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ ११३/११६*
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जे कबहूँ हरि नांव तजि, कहै सुनै कोई आनं।
कहि जगजीवन तबै तुम, कहि मोहै अग्यांन ॥११३॥
संत जगजीवन जी कह रहै हैं कि कभी भी प्रभु भजन छोड़कर यदि और कुछ कहते सुनते हो तो यह तुम्हारा अज्ञान ही है।
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ए व्रत वोडि६ निबाहिये, रसना श्रवणै नांम ।
कहि जगजीवन रांमजी, तुम चित चार्यों जांम७॥११४॥
संत जग जीवन जी कहते हैं कि हे जीव कल्याण हेतु इस व्रत का पालन करें कि जिह्वा नाम गाये, कान नाम सुने और चारों पहर प्रभु ध्यान ही रहे।
(६. वोडि-अन्त तक) {७. जांम-याम(प्रहर)}
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भूले हूँ१ हरि भगति बिन, मति कोइ उपजै आंन ।
कहि जगजीवन रांम बिन, ए सब फीके ग्यांन ॥११५॥
संत जग जीवन जी कहते हैं कि भूल से भी कोइ अन्य विचार जो भक्ति से परे हो ना आये क्योंकि प्रभु स्मरण के बिना ये सारे ज्ञान व्यर्थ हैं।
(१. भूले हूँ-प्रमादवश भी)
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रांम बिना दूजी कथा, कहै सुनै मति कोइ ।
जगजीवन इस तोल२ बिन, अंत काल दुःख होइ ॥११६॥
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि रामनाम के बिना हम अन्य कोइ भी बात ना कहै ना सुने । जो यह बात नहीं जानता दूसरे विषयों की और भागता है वह अतंतः दुखी होता है। (२. तोल-दृढ निर्णय)
(क्रमशः)

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