शुक्रवार, 6 मार्च 2020

*२. स्मरण का अंग ~ ११७/१२०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ ११७/१२०*
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मेरे वाणी एक ही, दूजी भाखूं नांहि ।
कहि जगजीवन रांम हरि, देव निरंजन मांहि ॥११७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि मेरी वाणी एक ही प्रभु स्मरण में लगी रहे मैं और कुछ ना बोलूं वे ही राम हैं, हरि हैं, निरंजन देव है।
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कहि जगजीवन बोल नां, बोल्यां बिगड़ै बात ।
जे बोलै तो प्रेम सौं, रांम हृदै मिलि जात ॥११८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि व्यर्थ सम्भाषण ना करें उससे बात बिगड़ती ही है। अगर बोलना ही है तो प्रेम से बोले तो प्रभु हृदय में ही मिल जायेंगे।
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सकल काम क्रित होहिंगे, हरि चरणौं चित लाइ ।
जगजीवन भगवंत भजि, गोबिंद के गुण गाइ ॥११९॥
संत जगजीवन जी कह रहै हैं कि हे जीव तेरे सारे काम पूरे होगें क्रियान्वित होंगे तो अपना ध्यानं प्रभु चरणों में लगाये रख। भगवान का भजन करें वं गोविंद प्रभु के गुण गाते रहैं।
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सुरति न सुमिरण बीसरै, आंन बिसरि सब जाइ ।
रमैं निरंतर रांम सौं, जगजीवन जस गाइ ॥१२०॥
संत कहते हैं कि ध्यान से स्मरण कभी भी विस्मृत ना हो, चाहे और सब विस्मृत हो जाये । राम नाम में रमते हुए निरंतर उस प्रभु का गान करते रहैं।
(क्रमशः)

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