शनिवार, 7 मार्च 2020

*श्रीरामकृष्ण तथा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर*

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*दीन गरीबी गहि रह्या, गरवा गुरु गम्भीर ।*
*सूक्ष्म शीतल सुरति मति, सहज दया गुरु धीर ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद ७~श्रीरामकृष्ण तथा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर*
(१)
*श्री विद्यासागर का मकान*
आज शनिवार है, श्रावण कृष्णा षष्ठी, ५ अगस्त १८८२ ई. । दिन के चार बजे होंगे । श्रीरामकृष्ण किराये की गाड़ी पर कलकत्ते के रास्ते बादुड़बागान की तरफ जा रहे हैं । भवनाथ, हाजरा और मास्टर साथ में हैं । आप पण्डित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के घर जाएँगे ।
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श्रीरामकृष्ण की जन्मभूमि जिला हुगली के अन्तर्गत कामारपुकुर गाँव है, जो पण्डित विद्यासागर की जन्मभूमि वीरसिंह गाँव के पास है । श्रीरामकृष्णदेव बाल्यकाल से ही विद्यासागर की दया की चर्चा सुनते आए हैं । दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में प्रायः उनके पाण्डित्य और दया की बातें सुना करते हैं । यह सुनकर कि मास्टर विद्यासागर के स्कुल में पढ़ाते हैं, आपने उनसे पूछा, “क्या मुझे विद्यासागर के पास ले चलोगे? मुझे उन्हें देखने की इच्छा होती है ।” 
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मास्टर ने जब विद्यासागर से यह बात कही तो उन्होंने हर्ष के साथ किसी शनिवार को चार बजे उन्हें साथ लाने को कहा । केवल यही पूछा- “कैसे परमहंस हैं? क्या वे गेरुए कपड़े पहनते हैं?” मास्टर ने कहा- “जी नहीं, वे एक अद्भुत पुरुष हैं; लाल किनारीदार धोती पहनते हैं? कुरता पहनते हैं, पालिश किए हुए स्लीपर पहनते हैं, रानी रासमणि के कालीमन्दिर की एक कोठरी में रहते हैं, जिसमें एक तखत है और उस पर बिस्तर और मच्छरदानी, उस बिस्तर पर लेटते हैं । कोई बाहरी भेष तो नहीं है, पर सिवाय ईश्वर के और कुछ नहीं जानते, अहर्निश उन्हीं का चिन्तन किया करते हैं ।”
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गाड़ी दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर से चलकर श्यामबाजार होते हुए अब अमहर्स्ट स्ट्रीट में आयी है । भक्त लोग कह रहे हैं कि अब बादुड़बागान के पास आयी है । श्रीरामकृष्ण बालक की भाँति आनन्द से बातचीत करते हुए आ रहे हैं । अमहर्स्ट स्ट्रीट में आकर एकाएक उनका भावान्तर हुआ-मानो ईश्वरावेश होना चाहता है ।
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गाड़ी राममोहन राय के बाग की बगल से आ रही है । मास्टर ने श्रीरामकृष्ण का भावान्तर नहीं देखा, झट कह दिया-‘यह राममोहन राय का बाग है ।’ श्रीरामकृष्ण नाराज हुए, कहा, ‘अब ये बातें अच्छी नहीं लगतीं ।’ आप भावाविष्ट हो रहे हैं ।
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विद्यासागर के मकान के सामने गाड़ी खड़ी हुई । मकान दुमंजिला है, साहबी ढंग से सजा हुआ है । मकान के चारों ओर खुली जगह है जो दीवार से घिरी हुई है । मकान के पश्चिम की ओर फाटक है । आँगन में बीच बीच में पुष्पवृक्ष लगे हुए हैं । नीचे पश्चिमवाले कमरे में ऊपर चढ़ने के लिए जीना है । विद्यासागर ऊपर रहता हैं । जीने से चढ़कर ऊपर जाते ही उत्तर की ओर एक कमरा है, उसके पूर्व की ओर एक हाल है । हाल के दक्षिण पूर्ववाले कमरे में विद्यासागर सोया करते हैं । दक्षिण की ओर और एक कमरा है । ये सारे कमरे कीमती पुस्तकों से भरे हैं । पुस्तकों पर सुन्दर जिल्द लगवाकर उन्हें अच्छी तरह सजाकर रखा गया है । हाल के पूर्व की ओर मेज और कुर्सी है । यहीं बैठकर विद्यासागर काम किया करते हैं । जो लोग उनसे मिलने आते हैं वे मेज के तीनों ओर रखी हुई कुर्सियों पर बैठा करते हैं । मेज पर कागज, कलम, स्याही आदि लिखने की वस्तुएँ, बहुतसी चिट्ठियाँ, और कुछ पुस्तकें रखी हुई हैं । इस मेज के दक्षिण दिशा के कमरे में एक छोटा बिछौना है । यहीं पर आप शयन करते हैं ।
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मेज पर जो चिट्ठियाँ रखी हुई हैं उनमें क्या लिखा है? शायद किसी विधवा ने लिखा है, ‘मेरा नाबालिग बच्चा अनाथ है, उसकी ओर देखनेवाला कोई नहीं, आप ही को उसकी ओर देखना होगा ।’ किसी ने लिखा है, ‘आप कहीं चले गए थे, इसलिए हमें इस माह का पैसा समय पर नहीं मिला, बड़ी तकलीफ हुई ।’ किसी गरीब छात्र ने लिखा है, ‘आपके स्कूल में निःशुल्क भरती तो हो गया हूँ, पर मुझमें पुस्तकें खरीदने की भी सामर्थ्य नहीं है ।’ किसी ने लिखा है, ‘मेरे परिवार के लोगों को खाने को नहीं मिल रहा है- मुझे एक नौकरी लगवा देनी होगी ।’ उनके स्कूल के किसी शिक्षक ने लिखा है, ‘मेरी बहन विधवा हो गयी है, उसका सारा भार मुझ पर आ पड़ा है, इतनी तनख्वाह में मेरा गुजर नहीं हो पाएगा ।’ शायद किसी ने विलायत से पत्र लिखा है, “मैं यहाँ विपत्ति में पड़ा हूँ; आप दीनबन्धु हैं, कुछ मदद भेजकर इस संकट से मेरी रक्षा करें ।’ किसी ने लिखा है, ‘अमुक तारीख को हमारे फैसले का दिन निश्चित हुआ है, उस दिन आप आकार हमारा झगड़ा मिटा दें ।’
श्रीरामकृष्णदेव गाड़ी से उतरे । मास्टर राह बताते हुए आपको मकान के भीतर ले जा रहे हैं । आँगन में फूलों के पेड़ हैं । उनके बीच में से जाते हुए श्रीरामकृष्ण बालक की तरह बटन में हाथ लगाकर मास्टर से पूछ रहे हैं, “कुरते के बटन खुले हुए हैं-इसमें कुछ हानि तो न होगी?” बदन पर एक सूती कुरता है और लाल किनारे की धोती पहने हुए हैं, जिसका एक छोर कन्धे पर पड़ा हुआ है । पैरों में स्लीपर है । मास्टर ने कहा- “आप इस सब के लिए चिन्ता न कीजिये, आपकी कहीं कुछ त्रुटि न होगी । आपको बटन नहीं लगाना पड़ेगा ।” समझाने पर लड़का जैसे शान्त हो जाता हिया, आप भी वैसे शान्त हो गए ।
(क्रमशः)

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