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*दादू खोजि तहाँ पीव पाइये, जहँ बिन जिह्वा गुण गाइ ।*
*तहँ आदि पुरुष अलेख है, सहजैं रह्या समाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(७)
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा, भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं, प्रसीद देवेश जगन्निवास ।। (गीता, ११/४५)
*ब्राह्मसमाज की प्रार्थनापद्धति । ईश्वर का ऐश्वर्य-वर्णन ।*
*पूर्वकथा- दक्षिणेश्वर के राधाकान्त मन्दिर में जेवर की चोरी*
श्रीरामकृष्ण(शिवनाथ आदि से)- क्यों जी, तुम लोग इतना ईश्वर के ऐश्वर्य का वर्णन क्यों करते हो? मैंने केशव सेन से यही कहा था । एक दिन केशव वहाँ(कालीमन्दिर) गया था । मैंने कहा, तुम लोग किस तरह लेक्चर देते हो, मैं सुनूँगा ।
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गंगाघट की चाँदनी में सभा हुई, और केशव बोलने लगा । खूब बोला । मुझे भाव हो गया था । बाद में केशव से मैंने कहा, तुम सब इतना क्यों बोलते हो- हे ईश्वर, तुमने कैसे सुन्दर सुन्दर फूलों की रचना की, तुमने आकाश की सृष्टि की, तुमने नक्षत्र बनाए, तुमने समुद्र का सृजन किया, -यह सब ! जो स्वयं ऐश्वर्य चाहते हैं उन्हें ईश्वर के ऐश्वर्य का वर्णन करना अच्छा लगता है ।
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जब राधाकान्त मन्दिर का जेवर चोरी हो गया था, तब बाबू(रानी रासमणि के जामाता) राधाकान्त के मन्दिर में जाकर ठाकुरजी से बोले, ‘क्यों महाराज, तुम अपने जेवर की रक्षा न कर सके !’ मैंने बाबू से कह, ;यह तुम्हारी कैसी बुद्धि है ! स्वयं लक्ष्मी जिनकी दासी हैं, चरणसेवा करती हैं, उनको ऐश्वर्य की क्या कमी है? यह जेवर तुम्हारे लिए ही अमोल वस्तु है, ईश्वर के लिए तो कंकड़-पत्थर है । राम राम ! ऐसी बुद्धिहीनता की बातें न किया करो । कौन बड़ा ऐश्वर्य तुम उन्हें दे सकते हो ?’
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इसीलिए कहता हूँ जिसका मन जिस पर रम जाता है वह उसी को चाहता है; कहाँ वह रहता है, उसकी कितनी कोठियाँ हैं, कितने बगीचे हैं, कितना धन है, परिवार में कौन कौन है, नौकर कितने हैं- इसकी खबर कौन लेता है? जब मैं नरेन्द्र को देखता हूँ, तब सब कुछ भूल जाता हूँ । उसका घर कहाँ है, उसका बाप क्या करता है, उसके कितने भाई हैं, ये सब बातें कभी भूलकर भी नहीं पूछी, ईश्वर के मधुर रस में डूब जाओ । उनकी सृष्टि अनन्त है, ऐश्वर्य अनन्त है । ज्यादा ढूँढ़-तलाश की क्या जरूरत ?
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श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से गाने लगे । गीत इस आशय का है- “ ‘ऐ मन तू रूप के समुद्र में डूबा जा । तलातल पाताल खोजने पर तुझे प्रेमरत्न-धन मिलेगा । खोज, जी लगाकर खोज । खोजने ही से तू हृदय में वृन्दावन देखेगा । तब वहाँ सदा ज्ञान की बत्ती जलेगी । भला ऐसा कौन है जो जमीन पर डोंगा चलायेगे ?”
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‘कबीर कहते हैं, तू सदा श्रीगुरु का चरणचिन्तन कर ।’
“दर्शन के बाद कभी कभी भक्त की साध होती है कि उनकी लीला देखें । श्रीरामचन्द्रजी जब राक्षसों को मारकर लंकापुरी में घुसे तब बुड्ढी निकषा भागी । तब लक्ष्मण बोले, ‘हे राम, भला यह क्या है? यह निकषा इतनी बुड्ढी है, पुत्रशोक भी इसको कम नहीं हुआ, फिर भी इसे प्राणों का इतना भय है कि भाग रही है !’ श्रीरामचन्द्रजी ने निकषा को अभय देते हुए सामने लाकर कारण पूछा । वह बोली, ‘राम इतने दिनों तक बची हूँ, इसीलिए तुम्हारी इतनी लीला देखी । यही कारण है कि और भी बचना चाहती हूँ । न जाने और कितनी लीलाएँ देखूँ’ ।” (सब हँसते हैं ।)
(क्रमशः)

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