🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त Ram Gopal तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*३. नांम कौ अंग ~ १७३/१७६*
.
जे मन सुणैं सोई कहै, हरि घरि नांम प्रकास ।
निज जन रसनां रांमजी, सु कहि जगजीवनदास ॥१७३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो ये मन सुनता वही कहता है। ईश्वर के तेजोमय प्रकाश पुंज का नाम हरि है, प्रभु के जन अपनी जिह्वा द्वारा उसी हरि व राम शब्द का उच्चारण करते हैं।
.
कथा कीरतन भगती हरि, रांम नांम गुन गाइ ।
कहि जगजीवन प्रेम पिव, पारंगति जन थाइ ॥१७४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कथा, कीर्तन, प्रभु कि भक्ति ये सब हरि नाम, राम नाम, स्मरण, प्रभु प्रेम का पान करना है जिसे पीकर जन पार उतरते हैं।
.
हेत बंध्यौ हरि नांम सौं, ह्रिदै विराजै रांम ।
कहि जगजीवन हरि भगत, नूर पीवै निज ठांम ॥१७५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हरि नाम से प्रेम हो और हृदय में प्रभु विराजते हों ऐसी स्थिति में हरि भक्त अपने स्थान पर ही तेज का आनंद लेते हैं।
.
मुख हरि रसनां रांमजी, रांम ह्रिदै प्रकास ।
रांम रांम मुख ऊचरै, सु कहि जगजीवनदास ॥१७६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मुख में हरि नाम व जिह्वा पर राम जी का नाम हो हृदय में राम नाम का प्रकाश हो राम राम शब्द का मुख से उच्चारण होता रहे यही श्रेष्ठ है।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें