सोमवार, 6 अप्रैल 2020

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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग आसावरी ९ (गायन समय प्रात: ६ से ९)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२३५ - समर्थाई । झपताल
हरे ! हरे !! 
सकल भुवन भरे, जुग जुग सब करे ।
जुग जुग सब धरे, 
अकल सकल जरे, हरे हरे ॥टेक॥
सकल भुवन छाजै, 
सकल भुवन राजै, सकल कहै ।
धरती अम्बर गहै, 
चँद सूर सुधि लहै, पवन प्रकट बहै ॥१॥
घट घट आप देवै, 
घट घट आप लेवै, मँडित माया ।
जहां तहां आपराया, 
जहां तहां आप छाया, अगम अगम पाया ॥२॥
रस माँहीं रस राता, 
रस माँहीं रस माता, अमृत पीया ।
नूर माँहीं नूर लीया, 
तेज माँहीं तेज कीया, दादू दरश दीया ॥३॥
ईश्वर सामर्थ्य दिखा रहे हैं - हे जन्मादि क्लेशों के अपहरण करने वाले हरे ! आप सम्पूर्ण भुवनों में परिपूर्ण हैं । प्रति युग में धर्म स्थापनादि सब कार्य आप ही करते हैं तथा प्रति युग में आप ही सबको धारण करते हैं । हरे ! आप कला रहित हैं और सब में आत्म रूप से प्रकाशित हो रहे हैं । 
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सब कहते हैं - आप सब भुवनों में विराजते हैं, सब भुवन आप से ही अच्छे लगते हैं । आप ही अपनी सत्ता से पृथ्वी और आकाश को पकड़े हुये हैं । आपसे ही चन्द्र - सूर्य अपने गमनागमनादि का ज्ञान प्राप्त करते हैं । आपकी सत्ता से ही वायु प्रकट रूप से चल रहा है ? 
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प्रति शरीर को आप ही अपनी सत्ता देते हैं और प्रति शरीर की भावना ग्रहण करते हैं । यह मायिक सँसार आप से ही शोभित है । जहां तहां आप राजा रूप से व्याप्त हैं । आप अगम से भी अगम स्थान में प्राप्त होते हैं । 
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जब आप रस - रूप प्रभु में मैं भक्ति - रस के द्वारा अनुरक्त हुआ तब ज्ञानामृत का पान करके आप रस - स्वरूप में रस - रूप होकर मस्त हो गया हूँ, अब तो आत्म - स्वरूप में ही ब्रह्म - स्वरूप प्राप्त कर लिया है । आत्म - तेज में ही ब्रह्म तेज प्राप्त किया है । उन प्रभु ने इस प्रकार कृपा करके दर्शन दिया है । यही उनकी सामर्थ्य है ।
(क्रमशः)

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