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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग परजिया(परज) १३, (गायन समय रात्रि ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२५९ - परिचय । खेमटा ताल
नूर रह्या भरपूर, अमी रस पीजिये ।
रस माँहीं रस होइ, लाहा लीजिये ॥टेक॥
परकट तेज अनँत, पार नहिं पाइये ।
झिलमिल झिलमिल होइ, तहां मन लाइये ॥१॥
सहजैं सदा प्रकाश, ज्योति जल पूरिया ।
तहां रहें निज दास, सेवक सूरिया ॥२॥
सुख सागर वार न पार, हमारा वास है ।
हँस रहें ता माँहिं, दादू दास है ॥३॥
इति राग परजिया(परज) समाप्त: ॥१३॥पद १॥
साक्षात्कार की प्रेरणा करते हुये स्थिति बता रहे हैं - ब्रह्म प्रकाश सर्वत्र परिपूर्ण है, उसका चिन्तनरूप अमृत पान करो और उस रस रूप ब्रह्म में रस रूप आत्मा एक हो सके, ऐसा विचार करके अभेद स्थिति रूप लाभ लो ।
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वह अनन्त तेज रूप ब्रह्म समाधि में प्रकट रूप से भासता है, किन्तु उसका आदि अन्त ज्ञात नहीं होता, वह अपार है । जहां झिलमिल - झिलमिल प्रकाश हो रहा है वहां ही अपने मन को लगाओ ।
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वह प्रकाश सदा सहज भाव से जल में ज्योति प्रतिविम्ब के समान भासता है । भगवान् के निज दास साधन में वीर निष्काम भक्त ही वृत्ति द्वारा उस प्रकाश के पास रहते हैं ।
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जो वार - पार रहित सुख - सागर है, उसी में हम भक्त रूप हँसों का निवास रहता है ।
इति श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका राग परजिया(परज) समाप्त: ॥१३॥
(क्रमशः)

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