🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*तन मन मैदा पीसकर, छांण छांण ल्यौ लाइ ।*
*यों बिन दादू जीव का, कबहूँ साल न जाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*संयम कसौटी का अंग ११६*
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रज्जब निकसे धातु१ धर२, महा मशकती३ द्वार ।
तो कष्ट बिना क्यों उद्धरै, आतम इहिं आकार ॥२१॥
महान् परिश्रम२ के द्वारा पृथ्वी१ से सुवर्ण आदि धातु निकलती हैं, तब बिना कष्ट के आत्मा का इस स्थूल३ शरीर से कैसे उद्धार हो सकता है ।
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तन कसणी१ निष्काम मन, द्वै धट द्वै कौपीन ।
जन रज्जब यह रहति२ गति३, आतम राम हि लीन ॥२२॥
स्थूल और सूक्ष्म इन दोनों शरीरों के दो कोपीन हैं, स्थूल शरीर के संयम कष्ट१ रूप कौपीन है और सूक्ष्म शरीर रूप मन को निष्कामता रूप कौपीन है यह इस प्रकार के ब्रह्मचर्य२ की चेष्टा२ आत्मस्वरूप राम में लीन करती है ।
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उनमनि१ लागे मन सधै२, शब्द सधै३ सु विचार ।
रज्जब तन तामस४ सधै, विरला साधनहार ॥२३॥
समाधि१ में लगने से मनोनिग्रह सिद्ध२ होता है, सुविचार से शब्द प्रयोग ठीक४ होता है, शरीर के संयम में तमोगुण३ जय रूप कार्य सिद्ध होता है, उक्त तीनों साधना करने वाला विरला ही होता है ।
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शंख शुक्ति मुक्ता१ सहित, सदा महौदधि२ दानि३ ।
पै रज्जब चौदह रतन, सो संकट दे आनि४ ॥२४॥
मोती१ के सहित शंख और सीप तो समुद्र२ सदा देता३ ही है किन्तु उसमें जो चौदह रत्न हैं उनको तो संकट आने४ पर ही देता है ।
(क्रमशः)

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