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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ १०५/१०८*
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जे उपजी सोई कही, सोच न मांहै सोच ।
कहि जगजीवन बिरह बिन, प्रक्रिति वानी पोच५ ॥१०५॥
(५. पोच-तुच्छ, हीन)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि मेरे हृदय में जो अनुभव से उत्पन्न हुयी वही मेरे द्वारा कही गयी । संत कहते हैं कि, प्रभु विरह बिना सभी प्रयास तुच्छ हैं।
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रांम नांम बाणी सरस, दरद दया हरि नांम ।
कहि जगजीवन विरहसर६, लागत बिसरे कांम ॥१०६॥
(६. विरहसर-विरहबाण)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि राम नाम की वाणी हो और स्मरण के लिए दर्द का भाव हो तो इस प्रकार लगे विरह बाण से सारी कामनाएं नष्ट हो जाती है।
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कहि जगजीवन लोभ लै, बड़ी पाप की नाव ।
ते नर बूड़े धार मंहि, (जिनके) रांम भगति नहिं भाव ॥१०७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि लालच का भार वहन कर जब जीवात्मा पाप की नाव में सवार हो, भव की और बढता है तो वह निश्चय ही बिना भक्ति मंझधार में जाकर डूबता है।
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रांम पुकारै बिरहनी, ज्यौं मोर पुकारै मेह ।
कहि जगजीवन बरसिये, हरि रस भीजै देह ॥१०८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि विरहिणी जीवात्मा प्रियतम राम को ऐसे पुकारती है जैसे मयूर वर्षा को पुकारते हैं। हे प्रभु, दर्शन रस रूपी मेह द्वारा इस जीवात्मा को सराबोर कीजिये।
(क्रमशः)

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