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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
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*॥ आसक्ता मोह ॥
*दादू झूठी काया झूठ घर, झूठा यहु परिवार ।*
*झूठी माया देखकर, फूल्यो कहा गँवार ॥४२॥*
*दादू झूठा संसार, झूठा परिवार, झूठा घर बार,*
*झूठा नर नार, तहाँ मन माने ।*
*झूठा कुल जात, झूठा पितु मात, झूठा बंधु भ्रात,*
*झूठा तन गात, सत्य कर जाने ।*
*झूठा सब धंध, झूठा सब फंध, झूठा सब अंध,*
*झूठा जाचंध, कहा मग छाने ।*
*दादू भाग, झूठ सब त्याग, जाग रे जाग, देख दीवाने ॥४३॥*
हे अज्ञ साधक ! यह शरीर, घर, परिवार, धन, संसार, नर, नारी, कुल, जाति, पिता, माता, भाई, बान्धव यह सब ज्ञान दृष्टि से देखने पर मिथ्या ही हैं, अतः इन में ममता मत कर । इनमें किसलिये आसक्त हो रहा है, जन्मान्ध पुरुष की तरह इनमें क्या सार खोज रहा है? हे मोहनिद्राग्रस्त जीव ! इस मोह रात्रि से जाग । इस मिथ्या संसार को शीघ्र त्यागकर ईश्वर के शरण में जावो और उन्हीं को भजो । तब ही तुम्हारे को ब्रह्म का साक्षात्कार होगा ।
लिखा है कि- यह संसार असार है, दुःख रूप मोह को पैदा करने वाला है । न कोई किसी का बेटा है, न किसी का धन है । जो इससे प्रेम करता है वह दिन रात जलता है । इस शरीर में हाड़ तो खम्भे हैं, स्नायुजाल से बंधा हुआ है, मांस और खून से लिपा हुआ है, चर्म से लिपटा हुआ दुर्गन्धी वाला एवं मूत्र विष्ठा का पात्र है । वृद्धावस्था, शोक तथा रोग का मन्दिर, क्षणभंगुर, दुष्पुर दुर्धर आदि दोषों से दूषित है, अतएव यह दुष्ट है । जिसके अन्त में कृमिविष्ठाभस्म बन जाते हैं । अतः तू इस अस्थिर शरीर को प्राप्त करके स्थिर कर्म क्यों नहीं प्राप्त कर लेता । जो प्रातःकाल भोजन किया, वह सांयकाल ही नष्ट हो जाता है । उसी खाये हुए अन्न के रस से यह पुष्ट होता है । अतः यह शरीर नित्य कैसे हो सकता है? इस संसार में हजारों माता-पिता तथा सैकड़ों, पुत्र स्त्री आदि का अनुभव किया है । अतः कौन किसके माता-पिता और कौन किसका बेटा तथा स्त्री है? अर्थात् सब सम्बन्ध कल्पित हैं । उन कल्पित सम्बन्धों से दुःखी नहीं होना चाहिये । दुःख है कि इस संसार में घर कुटुम्ब परिवार में महान् क्लेश और भय को देखते हुए भी बड़े-बड़े विद्वान् भी बूढे होने पर भी इसको त्याग नहीं सकते । अतः यह माया का खेल दुस्तर है ।
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*॥ आसक्ता ॥*
*दादू झूठे तन के कारणै, कीये बहुत विकार ।*
*गृह दारा धन संपदा, पूत कुटुम्ब परिवार ॥४४॥*
यह देह नाशवान् है । क्योंकि गीता में लिखा है कि-जो पैदा होता है उसकी मृत्यु निश्चित है । तथा जन्म मृत्यु हर्ष शोक भूख प्यास इन उर्मियों से युक्त है पुत्र मित्र कलत्र धन धान्य कुटुम्ब आदि परिवार से वेष्टित होता हुआ केवल दुःख के लिये ही है । उस शरीर के पालन के लिये कपटपूर्ण व्यवहार करते हुए जीवात्मा परमात्मा तक को भूल गया ।
(क्रमशः)

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