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*सकल शिरोमणि सब सुख दाता, दुर्लभ इहि संसार ।*
*दादू हंस रहैं सुख सागर, आये पर उपकार ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. १६४)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*७२. क़ाज़ी की शरणागति*
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वन्दे स्वैराद्भुतेअहं तं चैतन्यं यत्प्रसादत:।
यवना: सुमनायन्ते कृष्णनामप्रजल्पका:॥ [१]
([१] जिनकी अनुकम्पा ये यवन भी सच्चरित्र होकर श्रीकृष्ण के सुमधुर नामों का जप करने वाले बन जाते हैं, उन स्वच्छन्द अद्भुत चेष्टाएं करने वाले श्रीमहाप्रभु चैतन्य देव के चरणकमलों में हम प्रणाम करते हैं। चै. चा आ. १७/१)
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बिना मुकुट के राजा भी होते हैं और बिना शस्त्र के सेना भी लड़ सकती है। जो मुकुटधारी राजा अथवा महाराजा होते हैं, उनके तो प्राय: जनता के ऊपर भय से आधिपत्य होता है, वे भीतर से उससे द्वेष भी रख सकते हैं और जनता कभी-कभी उनके विरुद्ध बलवा भी कर सकती है, किंतु जो बिना मुकुट के राजा होते हैं उनका तो जनता के हृदयों पर आधिपत्य होता है। वे तो प्रेम से ही सभी लोगों को अपने वश में कर सकते हैं।
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चाहे मुकुटधारी राजा की सेना रणक्षेत्र से भय के कारण भाग आवे, चाहे उसकी पराजय ही हो जाय, किंतु जिनका जनता के हृदयों के ऊपर आधिपत्य है, जनता के अन्त:करण पर जिनके शासन की प्रेम-मुहर लगी हुई है, उनके सैनिक चाहे शस्त्रधारी हों अथवा बिना शस्त्र के, बिना जय प्राप्त किये मैदान से भागते ही नहीं।
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क्योंकि वे अपने प्राणों की कुछ भी परवा नहीं करते। जिसे अपने प्राणों की कुछ भी परवा नहीं, जो मृत्यु का नाम सुनकर तनिक भी विचलित न होकर उसका सर्वदा स्वागत करने के लिये प्रस्तुत रहता है, उसके लिये संसार में कोई काम दुरूह नहीं। उसे इन बाह्यशस्त्रों की उतनी अधिक अपेक्षा नहीं, उसका तो साहस ही शस्त्र है।
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वह निर्भिक होकर अपने साहसरूपी शस्त्र के सहारे अन्याय के पक्ष लेने वाले का पराभव कर सकता है। फिर भी वह अपने विरोधी के प्रति किसी प्रकार के बुरे विचार नहीं रखता। वह सदा उसके हित की ही बात सोचता रहता है, अन्त में उसका भी कल्याण हो जाता है। प्रेम में यही तो विशेषता है।
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प्रेममार्ग में कोई शत्रु ही नहीं। घृणा, द्वेष, कपट, हिंसा अथवा अकारण कष्ट पहुँचाने के विचार तक उस मार्ग में नहीं उठते, वहाँ तो ये ही भाव रहते हैं-
सर्वे कुशलिन: सन्तु सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥[२]
([२] सभी सुखी हों, सब स्वस्थ हों, सभी कल्याणमार्ग के पथिक बन सकें, कोई भी दु:खी न हो।)
इसी का नाम ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’, ‘सविनय अवज्ञा’ अथवा ‘सत्याग्रह’ है।
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महाप्रभु गौरांगदेव ने संकीर्तन रोकने के विरोध में इसी मार्ग का अनुसरण करना चाहा। क़ाज़ी की नीच प्रवृत्तियों के दमन करने के निमित्त उन्होंने इसी उपाय का अवलम्बन किया। सब लोगों से उन्होंने कह दिया- ‘आप लोग घबड़ायँ नहीं, मैं स्वयं क़ाज़ी के सामने संकीर्तन करता हुआ निकलूंगा, देखें, वह मुझे संकीर्तन से किस प्रकार रोकता है?’ प्रभु के ऐसे आश्वासन से सभी को परम प्रसन्नता हुई और सभी अपने-अपने घरों को चले गये।
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दूसरे दिन महाप्रभु ने नित्यानन्द जी को आज्ञा दी कि सम्पूर्ण नगर में इस संवाद को सुना आओ कि ‘हम आज सायंकाल के समय क़ाज़ी की आज्ञा के विरुद्ध नगर में संकीर्तन करते हुए निकलेंगे। संध्या के समय सभी लोग हमारे घर पर एकत्रित हों और प्रकाश के लिये एक-एक मशाल भी साथ लेते आवें।’
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नित्यानन्द जी तो बहुत दिन से यही बात चाहते भी थे। उनकी इच्छा थी कि ‘एक दिन महाप्रभु सम्पूर्ण नगर में संकीर्तन करते हुए निकलें तो लोगों को पता चल जाय कि संकीर्तन में कितना माधुर्य है। उन्हें विश्वास था कि जो लोग संकीर्तन का विरोध करते हैं, यदि वे लोग एक दिन भी गौरांग के प्रेम-नृत्य को देख लेंगे, तो वे सदा के लिये गौरांग के तथा उनके संकीर्तन के भक्त बन जायंगे। महाप्रभु के खुलकर कीर्तन करने से भयभीत भक्तों का भय भी दूर भाग जायगा और अन्य लोगों को भी फिर संकीर्तन करने का साहस होगा। बहुत-से लोग हृदय से संकीर्तन के समर्थक हैं, किंतु क़ाज़ी के भय से उनकी कीर्तन करने से हिम्मत नहीं होती। प्रभु कि प्रोत्साहन की ही आवश्यकता है।’
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इन बातों को नित्यानन्द जी मन-ही-मन में बहुत दिनों से सोच रहे थे। किंतु उन्होंने किसी पर अपने इन भावों को प्रकट नहीं किया। आज स्वयं महाप्रभु को नगर-कीर्तन करने के लिये उद्यत देखकर उनके आनन्द का पारावार नहीं रहा। वे हाथ में घण्टा लेकर नगर के मुहल्ले-मुहल्ले और गली-गली में घर-घर घूम-घूमकर इस शुभ संवाद को सुनने लगे। पहले वे घण्टे को जोरों से बजा देते।
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घण्टे की ध्वनि सुनकर बहुत-से स्त्री-पुरुष वहाँ एकत्रित हो जाते, तब नित्यानन्द जी हाथ उठाकर कहते- ‘भाइयो ! आज शाम को श्रीगौरहरि अपने सुमधुर संकीर्तन से सम्पूर्ण नगर के लोगों को पावन बनावेंगे। नगरवासी नर-नारियों की चिरकाल की मनोवांछा आज पूरी होगी। सभी लोगों को आज प्रभु के अद्भुत और अलौकिक नृत्य के रसास्वादन का सौभाग्य प्राप्त होगा।’
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‘सभी भाई संकीर्तनकारी भक्तों के स्वागत के निमित्त अपने-अपने घरों को सुन्दरता के साथ सजावें और शाम को सभी एक-एक मशाल लेकर प्रभु के घर पर आवें। वहाँ किसी प्रकार का शोर-गुल न मचावें। बस, संकीर्तन का सुख लूटते हुए अपने जीवन को कृतकृत्य बनावें।’ सभी लोग इस मुनादी को सुनते और आनन्द से उछलने लगते।
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सामूहिक कार्यों में एक प्रकार का स्वाभाविक जोश आ जाता है। उस जोश में सभी प्रकार के लोग एक अज्ञातशक्ति के कारण खिंचे-से चले आते हैं, जिनसे कभी किसी शुभकाम की आशा नहीं की जाती वे भी जोश में आकर अपनी शक्ति से बहुत अधिक कार्य कर जाते हैं, इसीलिये तो कलिकाल में सभी कार्यों के लिये संघशक्ति को ही प्रधानता दी गयी है।
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नवद्वीप में ऐसा नगर-कीर्तन पहले कभी हुआ ही नहीं था। वहाँ के नर-नारियों के लिये यह एक नूतन ही वस्तु थी। लोग बहुत दिनों से निमाई के नृत्य और कीर्तन की बातें तो सुनते थे, किंतु उन्होंने आज तक कभी निमाई का नृत्य तथा कीर्तन देखा नहीं था।
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श्रीवास पण्डित के घर के भीतर संकीर्तन होता था और उसमें खास-खास भक्तों के अतिरिक्त और कोई जा ही नहीं सकता था, इसीलिये नगरवासियों की कीर्तनानंद देखने की इच्छा मन-ही-मन में दब-सी जाती। आज नगर कीर्तन की बात सुनकर सभी की दबी हुई इच्छाएं उभड़ पड़ी। लोग अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार संकीर्तन के स्वागत के निमित्त भाँति-भाँति की तैयारियां करने लगे।
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कहावत है ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलने लगता है’ जब भगवद्भक्त अपने-अपने घरों को बंदनवार, कदलीस्तम्भ और ध्वजा-पताकाओं से सजाने लगे, तब उनके समीप रहने वाले शाक्त अथवा विभिन्न पन्थवाले लोग भी शोभा के लिये अपने-अपने दरवाजों के सामने झंडियां लगाने लगे, जिससे हमारे घर के कारण नगर की सजावट में बाधा न पड़े। किसी जोशीले नये काम के लिये सभी लोगों के हृदयों में स्वाभाविक ही सहानुभुति उत्पन्न हो जाती है।
(क्रमशः)

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