सोमवार, 6 अप्रैल 2020

*७२. क़ाज़ी की शरणागति*

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*निर्भय नाम निरंजन लीजे,*
*इन लोगन का भय नहिं कीजे ॥*
*सेवक शूर शंक नही मानै,*
*राणा राव रंक कर जानै ॥*
*नाम निशंक मगन मतवाला,*
*राम रसायन पीवै पियाला ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. ३८९)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*७२. क़ाज़ी की शरणागति*
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जोशीले नये कार्य की घूम-घाम से तैयारियां होते देखकर विपक्षी भी उसमें सहयोग देने लगते हैं। उस समय उनके विरोधी भाव दूर हो जाते हैं, कारण कि उग्र विचारों का प्रभाव तो सभी प्रकारके लोगों के ऊपर पड़ता है। इसलिये जो लोग अपनी नीच प्रकृति के कारण संकीर्तन तथा श्रीगौरांग से अत्‍यंत ही द्वेष मानते थे, उन अकारण जलने वाले खल पुरुषों के घरों को छोड़कर सभी प्रकार के लोगों ने अपने-अपने घरों को भलीभाँति सजाया।
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नगर की सुंदर सड़कों पर छिड़काव किया गया। स्‍थान-स्‍थानपर धूप, गुग्‍गुल आदि सुगन्धित वस्‍तुएं जलायी गयीं। सड़क के किनारे के दुमंजले-तिमंजले मकान लाल, पीली, हरि, नीली आदि विविध प्रकार की रंगीन साड़ियों से सजाये गये थे।
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कहीं कागज की पताकाएँ फहरा रही हैं तो कहीं रंगीन कपड़ों की झंडियाँ शोभा दे रही हैं। भक्‍तों ने अपने-अपने द्वारों पर मंगलसूचक कोरे घड़े जल से भर-भरकर रख दिये हैं। द्वारों पर गहरों के सहित केले के वृक्ष बड़े ही सुदंर तथा सुहावने ने दिखायी देते थे। लोगों का उत्‍साह इतना अधिक बढ़ गया था कि वे बार-बार यही सोचते थे कि हम संकीर्तन के स्‍वागत के निमित्त क्‍या-क्‍या कर डालें।
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संकीर्तन-मण्‍डल किधर होकर निकलेगा और कहाँ जाकर उसका अंत होगा, इसके लिये कोई पथ तो निश्चित हुआ ही नहीं था। सभी अपनी-अपनी भावना के अनुसार यही समझते थे कि हमारे द्वार की ओर होकर संकीर्तन-मण्‍डल जरूर आवेगा। सभी का अनुमान था, हमें संकीर्तनकारी भक्‍तों के स्‍वागत-सत्‍कार करने का सौभाग्‍य अवश्‍य प्राप्‍त हो सकेगा।
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इसलिये वे महाप्रभु के सभी साथियों के स्‍वागतार्थ भाँति-भाँति की सामग्रियाँ सजा-सजाकर रखने लगे। इस प्रकार सम्‍पूर्ण नवद्वीप में चारों ओर आनन्‍द–ही-आनन्‍द छा गया। इतनी सजावट-तैयारियाँ किसी महोत्‍सव पर अथवा किसी महाराज के आने पर भी नगर में नहीं होती थीं। चारों ओर धूम-धाम मची हुई थी। भक्‍तों के हृदय मारे प्रेम के बांसों उछल रहे थे। तैयारियां करते-करते ही बात-की-बात में संध्‍या हो गयी।
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महाप्रभु भी घर के भीतर संकीर्तन की तैयारियाँ कर रहे थे। उन्‍होंने विशेष-विशेष भक्‍तों को बुलाकर नगर-कीर्तन की सभी व्‍यवस्‍था समझा दी। कौन आगे रहेगा, कौन उसके पीछे रहेगा और कौन सबसे पीछे रहेगा, ये सभी बातें बता दीं। किस सम्‍प्रदाय में कौन प्रधान नृत्‍यकारी होगा, इसकी भी वयवस्‍था कर दी।
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अब प्रभु के अन्‍तरंग भक्त गदाधर ने महाप्रभु श्रृंगार किया। प्रभु के घुंघराले काले-काले बालों में भाँति-भाँति के सुगन्धित तैल डालकर उसका जूरा बांधा गया, उसमें मालती, चम्‍पा आदि के सुगन्धित-पुष्‍प गूंथे गये। नासिका पर ऊर्ध्‍व-पुण्‍ड्र लगाया गया। केसर-कुंकुम की महीन बिन्दियों से मस्‍तक तथा दोनों कपोलो के ऊपर पत्रावली बनायी गयी।
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उनके अंग-प्रत्‍यंग की सजावट इस प्रकार की गयी कि एक बार कामदेव भी देखकर लज्जित हो उठता। महाप्रभु ने एक बहुत ही बढ़िया पीताम्‍बर अपने शरीर पर धारण किया। नीचे तक लटकती हुई थोड़ी किनारीदार चुनी हूई पीले रंग की धोती बड़ी ही भली मालूम होती थी।
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गदाधर ने घुटनों तक लटकने वाला एक बहुत ही बढ़िया हार प्रभु के गले में पहना दिया। उस हार के कारण प्रभु का तपाये हुए सुवर्ण के समान शरीर अत्‍यंत ही शोभित होने लगा। मुख में सुंदर पान की बीरी लगी हुई थी, इससे बायीं तरफ का कपोल थोड़ा उठा हुआ-सा दीखता था। दोनों अरुण अधर पान की लालिमा से और भी रक्तवर्ण के बन गये थे। उन्‍हें बिम्‍बा-फल की उपमा देने में भी संकोच होता था।
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कमान के समान दोनों कुटिल भ्रुकुटियों के मध्‍य में चारों ओर केसर लगाकर बीच में एक बहुत ही छोटी कुंकुम की बिन्‍दी लगा दी थी, पीतवर्ण के शरीर में वह लाल बिन्‍दी लाल रंग के हीरे की कनी की भाँति दूर ही चमक रही थी। इस प्रकार भलीभाँति श्रृंगार करके प्रभु घर से बाहर निकले।
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प्रभु के बाहर निकलते ही द्वारपर जो अपार भीड़ प्रभु की प्रतीक्षा कर रही थी, उसमें एकदम कोलाहल होने लगा। मानो समुद्र में ज्‍वार आ गया हो। सभी जोरों से ‘हरि बोल,’ ‘‍हरि बोल’ कहकर दिशा- विदिशाओं को गुँजाने लगे। लोग प्रभु के दर्शनों के लिये उतावले हो उठे। एक-दूसरे को धक्‍का देकर सभी पहले प्रभु के पाद-पद्मों के निकट पहुँचना चाहते थे।
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प्रभु ने अपने दोनों हाथ उठाकर भीड़ को शां‍त हो जाने का संकेत किया। देखते-ही-देखते सर्वत्र सन्‍नाटा छा गया। उस समय ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो यहाँ कोई है ही नहीं। गदाधर ने प्रभु के दोनों चरणों में नूपुर बांध दिये। फिर क्रमश: सभी भक्तों ने अपने-अपने पैरों में नूपुर पहन लिये। बायें पैर को ठमकाकर प्रभु ने नूपुरों की ध्‍वनि की। प्रभु के ध्‍वनि करते ही एक साथ ही सहस्‍त्रों भक्तों ने अपने-अपने नूपुरों का बजाया। भीड़ में आनन्‍द की तरंगें उठने लगीं।
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भीड़ में स्‍त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध तथा युवा सभी प्रकार के पुरुष थे। जाति-पांति का कोई भी भेद-भाव नहीं था, जो भी चाहे आकर संकीर्तन-समाज में सम्मिलित हो सकता था। किसी के लिये किसी प्रकार की रोक-टोक नहीं थी। भीड़ मे जितने भी आदमी थे, प्राय: सभी के हाथों में एक-एक मशाल थी। लोगों की सूझ ही तो ठहरी।
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प्रकाश के लिये मशाल न लेकर उस दिन मशाल ले चलने का एक प्रकार से माहात्‍म्‍य ही बन गया था, मानो सभी लोग मिलकर अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार छोटे-बड़े आलोक के द्वारा नवद्वीप के चिरकाल के छिपे हुए अज्ञानान्‍धकार को खोज-खोजकर भगा देने के ही लिये कटिबद्ध होकर आये हैं।
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किसी के हाथ में बड़ी मशाल थी, किसी के छोटी। किसी-किसी ने तो दोनों हाथों में दो-दो मशालें ले रखी थीं। छोटे-छोटे बच्‍चे छोटी-छोटी मशालें लिये हुए ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ कहकर उछल रहे थे। गोधूलि का सुखमय समय था।
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आकाश-मण्‍डल में स्थित भगवान दिवानाथ गौरचन्‍द्र के असह्यरूप-लावण्‍य से पराभव पाकर अस्‍ताचल में मुंह छिपाने के लिये उद्योग कर रहे थे। लज्‍जा के कारण उनका सम्‍पूर्ण मुख-मण्‍डल रक्‍तवर्ण का हो गया था। इधर आकाश में अर्धचन्‍द्र उदित होकर पूर्णचन्‍द्र के पृथ्‍वी पर अवतीर्ण होने की घोषणा करने लगे।
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शुक्‍ल पक्ष था, चांदनी रा‍त्रि थी, ग्रीष्‍मकाल का सुखद समय था। सभी प्रेम में उन्‍मत्त हुए ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ कहकर चिल्‍ला रहे थे। प्रभु ने भक्‍तों को नियमपूर्वक खड़े हो जाने का संकेत किया। सभी लोग पीछे हट गये। संकीर्तन करने वाले भक्‍त आगे खड़े हुए। प्रभु ने भक्‍त-मण्‍डली को चार सम्‍प्रदायों में विभक्‍त किया।
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सबसे आगे वृद्ध सेनापति भक्ति-सेना के महारथी भीष्‍म पितामह के तुल्‍य श्री अद्वैताचार्य का सम्‍प्रदाय था। उस सम्‍प्रदाय के वे ही अग्रणी थे। इनके पीछे श्रीवास पण्डित अपने दल-बल के सहित डटे हुए थे। श्रीवास पण्डित के सम्‍प्रदाय में छटे हुए कीर्तन कला में कुशल सैकड़ों भक्त थे। इनके पीछे महात्‍मा हरिदास का सम्‍प्रदाय था। सबसे पीछे महाप्रभु अपने प्रधान-प्रधान भक्तों के सहित खड़े हुए। प्रभु के दायीं ओर नित्‍यानंद जी और बायीं ओर गदाधर पण्डित शोभायमान थे।
(क्रमशः)

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