सोमवार, 6 अप्रैल 2020

*गृहस्थ के लिए उपाय - एकान्तवास तथा विवेक*

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*दादू कोटि अचारिन एक विचारी,* 
*तऊ न सरभर होइ ।* 
*आचारी सब जग भर्या, विचारी विरला कोइ ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ विचार का अंग)* 
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}* 
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ 
*गृहस्थ के लिए उपाय - एकान्तवास तथा विवेक* 
“परन्तु कोई एकदम फट से जनक राजा नहीं बन जाता । जनक राजा ने निर्जन में बहुत तपस्या की थी । संसार में रहते हुए भी बीच बीच में एकान्तवास करना चाहिए । गृहस्थी से बाहर निकलकर एकान्त में अकेले रहकर अगर भगवान् के लिए तीन दिन ही रोया जाय तो वह भी अच्छा है । यहाँ तक कि यदि अवसर पाकर एक ही दिन निर्जन में रहकर भगवच्चिन्तन किया जाए तो वह भी अच्छा है । लोग स्त्री-पुत्रों के लिए रोकर लोटाभर आँसू बहाते हैं, ईश्वर के लिए भला कौन रोता है? बीच बीच में निर्जन में रहकर भगवत्प्राप्ति के लिए साधना करनी चाहिए । संसार के भीतर, विशेषकर कामकाज की झंझट में रहकर प्रथम अवस्था में मन को स्थिर करते समय अनेक बाधाएँ आती हैं । जैसे रास्ते के किनारे लगाया हुआ पेड़; जिस समय वह पौधे की स्थिति में रहता है, उस समय घेरा न लगाने पर गाय-बकरियाँ खा जाती हैं । प्रथम अवस्था में घेरा । किन्तु बाद में तना मजबूत होने पर घेरे की आवश्यकता नहीं रहती । फिर उसे हाथी बांधनेपर भी कुछ नहीं होता ।” 
“रोग तो हुआ है सन्निपात का । पर जिस कमरे में सन्निपात का रोगी है, उसी कमरे में पानी का घड़ा और इमली का अचार रखा है । अगर रोगी को आराम पहुँचाना चाहते हो तो पहले उसे उस कमरे से हटाना होगा । संसारी जीव मानो सन्निपात का रोगी है; और विषय है पानी का घड़ा । विषयभोगतृष्णा मानो जलतृष्णा है । इमली, अचार की बात सिर्फ सोचते ही मुँह में पानी आ जाता है, वे चीजें पास नहीं लानी पड़तीं । ऐसी चीज रोगी के कमरे में ही रखी है । संसार में स्त्री-सहवास ऐसी ही चीज है । इसीलिए निर्जन में जाकर चिकित्सा कराना आवश्यक है ।” 
“विवेक-वैराग्य प्राप्त करके संसार में प्रवेश करना चाहिए । संसारसमुद्र में काम-क्रोधादि मगर हैं । बदन में हलदी मलकर पानी में उतरने पर मगर का डर नहीं रहता । विवेक-वैराग्य ही हलदी है । सदसत्-विचार का नाम विवेक है । ईश्वर ही सत् हैं, नित्यवस्तु हैं बाकी सब असत् अनित्य, दो दिन के लिए है-यह बोध ही विवेक है । और ईश्वर के प्रति अनुराग चाहिए, प्रेम, आकर्षण चाहिए-जैसे गोपियों का कृष्ण के प्रति था । 
एक गाना सुनो- (भावार्थ)- “विपिन में बंसी बज उठी । मुझे तो जाना ही होगा, श्याम मेरी राह देख रहा है । तुम लोग चलोगी या नहीं, बताओ । तुम लोगों के लिए श्याम एक नाम है, पर सखि, मेरे लिए श्याम हृदय की व्यथा है । बंसी तुन्हारे कान में बजती है, पर मेरे तो वह हृदय में बजती है । श्याम की बंसी बज रही है । हे राधे, अब चलो, तुम्हारे बिना कुंज में शोभा नहीं आती ।” 
श्रीरामकृष्ण ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से यह गीत गाते गाते केशव आदि भक्तों से कहा, “राधाकृष्ण को मानो या न मानो, पर उनके इस आकर्षण को तो ग्रहण करो ! ईश्वर के लिए इस प्रकार की व्याकुलता हो, इसके लिए प्रयत्न करो । व्याकुलता के आते ही उन्हें प्राप्त किया जा सकता है ।” 
(क्रमशः)

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