सोमवार, 6 अप्रैल 2020

सुषिम जन्म कौ अंग ३/८


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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ ११. सुषिम जन्म कौ अंग)
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*दादू जेते गुण व्यापैं जीव को, ते ते ही अवतार ।* 
*आवागमन यहु दूर कर, समर्थ सिरजनहार ॥३॥* 
जीव के अन्तःकरण में सात्विक राजस तामस जो जो गुण हैं वे प्रगट होते रहते हैं । उन उन गुणों के अनुसार कार्य करने का जीव संकल्प करता है । वह संकल्प ही सात्विक राजस तामस भेद से जीव का जन्म माना जाता है । गीता में कहा है कि- 
जो जो नित्य कर्म आसक्तिरहित तथा रागद्वेष के बिना तथा फल की इच्छा को त्यागकर किया जाता है वह सात्विक कर्म है । 
कामभोग की इच्छा से अहंकार के साथ तथा आयास के साथ किया जाता है । वह कर्म राजस कर्म है । मैं इस कर्म के करने का अधिकारी हूँ या नहीं इस कर्म का क्या प्रयोजन होगा? और इस कर्म का स्वरूप क्या है । इस कर्म से किसी दूसरे का अहित तो नहीं है । तथा अपनी हानि तो नहीं है । इस कर्म को मैं कर भी सकता हूँ या नहीं? इन सबको बिना विचारे ही केवल मोहवश(बिना सोचे समझे) प्रारम्भ कर दिया जाता है वह कर्म तामस कहलाता है । 
हे प्रभो ! इन कर्मों के द्वारा मेरा आवागमन होता रहता है अतः इनको दूर करो । यह साधक प्रार्थना कर रहा है । 
*सब गुण सब ही जीव के, दादू व्यापैं आइ ।* 
*घट मांहि जामैं मरै, कोइ न जाणै ताहि ॥४॥* 
*जीव जन्म जाणै नहीं, पलक पलक में होइ ।* 
*चौरासी लख भोगवै, दादू लखै न कोइ ॥५॥* 
इस हृदयाकाश अन्तःकरण में(सूक्ष्म शरीर में) मन, बुद्धि, चित्त अहंकार इन की वृत्तियों के द्वारा संस्कारवशात् जो जो सात्विक राजस तामस भाव पैदा होते है वे ही जीव के सूक्ष्म जन्म माने गये हैं । परन्तु जीव उनको नहीं जान रहा है । उन संकल्पों का क्षण क्षण में जो नाश हो रहा है वह ही मृत्यु है जीव की । इस तरह यह जीवात्मा इस शरीर में चौरासी लाख योनियों में सात्विक राजस तामस भावजन्य जो भोग है उनको भोगता हुआ अपने आत्मा के स्वरूप को भूल गया और दुःख स्वरूप ब्राह्म विषयों से जो सुख मिलता है उसकी इच्छा करता रहता है । 
सर्ववेदान्तसारसंग्रह में लिखा है कि- 
अज्ञानी जन अपने आत्मा के आनन्द को बिना जाने ही बाह्य सुखों के लिये चेष्टा करता है । जैसे घर में खजाना गड़ा पड़ा है परन्तु न जानने के कारण मूर्ख नगर में भिक्षा मांग रहा है । निधि को जानने वाला सुधी तो भिक्षा नहीं मांगता क्योंकि वह स्वयं ही धनी है । स्थूल सूक्ष्म शरीर स्वभावतः दुःखस्वरूप ही है । लेकिन अज्ञानी उन को ही आतमा मानकर और अपने सुखरूप आत्मा को भूलकर दुःख देने वालों से ही सुख की इच्छा करता है ।
*अनेक रूप दिन के करै, यहु मन आवै जाइ ।* 
*आवागमन मन का मिटै, तब दादू रहै समाइ ॥६॥* 
*निशिवासर यहु मन चलै, सूक्ष्म जीव संहार ।* 
*दादू मन थिर कीजिये, आतम लेहु उबारि ॥७॥* 
सूक्ष्म संस्कारों के कारण जिन जिन कर्मफलों को भोगने के लिये मन का जो रोज आना जाना होता है । यह ही सूक्ष्म जीवों का जन्म और संहार है । जब मन का यह आना जाना मिटे तब यह मन आत्मचिन्तन के द्वारा शुद्ध होकर ब्रह्मरूप होता है । विवेकचूड़ामणि में लिखा है कि- यह मन ही भोक्ता जीव के लिये स्थूल सूक्ष्म विषयों की कल्पना करता है । तथा शरीरवर्णजाति आश्रम आदि भेद भी मनःकल्पित हैं और यह मन ही असंग आत्मा को मोहित करके देह इन्द्रिय प्राण आदि के द्वारा बांध देता है । अर्थात् इनमें अध्यास करा देता है जिससे जीव इनको अपना मानकर ममभाव करता हुआ दिनरात अपने कर्मफलों को भोगना के लिये भ्रमण करता रहता है । अतः मन को जोतो । 
*कबहूँ पावक कबहूँ पाणी, धर अम्बर गुण बाइ ।* 
*कबहूँ कुंजर कबहूँ कीड़ी, नर पशुवा ह्वै जाइ ॥८॥* 
जब यह अग्नि की तरह गरम स्वभाव वाला होता है तब यह क्रोधी बन जाता है । हाथी की तरह जब कामवासना पैदा होती है तो यह कामी बन जाता है । कभी पृथ्वी की तरह जड बन जाता है और आकाश की तरह शून्य हो जाता है । जब यह दूसरों के छिद्रों को देखने लगता है तब चींटी बन जाता है । मलिन पदार्थों पर जाता है तो सूकर बन जाता है । जब क्रूरता को धारण करता है तो कुत्ता बन जाता है । हिंसा वृत्ति से सिंह बन जाता है । संशय वृत्ति से सर्प बन जाता है । 
(क्रमशः)

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