शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

*३. नांम कौ अंग ~ १६५/१६८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त Ram Gopal तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*३. नांम कौ अंग ~ १६५/१६८*
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रांम रिदा मंहि सुरति मंहि, मन ही हरि हरि होइ ।
कहि जगजीवन रांम बिन, खाली ठौर न कोइ ॥१६५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हृदय में राम का ध्यान करें मन में हरि हरि कहते रहें। राम के बिना कोइ भी स्थान नहीं है वे सर्वत्र व्याप्त हैं।
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परवो५ कंकर चुगै, चकोर चुगै अंगार ।
कहि जगजीवन हरि भगति, नांउ चुगै निज सार ॥१६६॥
(५. परेवी-कबूतर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कबूतर कंकर चुनकर खाता है चकोर पक्षी आग के अंगारे भक्षण करता है कबूतर जवार व चकोर चन्द्र के भ्रम ऐसा करते हैं। हे जीव तुम सार रुपक प्रभु के नाम का स्मरण करें।
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रांम नांम गुरु जब कह्या, तब अब आगै एह ।
कहि जगजीवन दोइ नहिं, रसना रांम सनेह ॥१६७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जब गुरु महाराज ने यह बता दिया कि राम नाम कहना है तो इसके आगे अब और कुछ भी नहीं इस जिह्वा का सारा स्नेह स्वाद अब राम कहना ही होगा।
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रांम रिदै रसनां रटै, रैणि रांम रस रूप ।
कहि जगजीवन ररंकार धुनि, नांम रकार अनूप ॥१६८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हृदय में राम, जिह्वा पर राम व राम रुप रस का आस्वादन करे रंरंकार ध्वनि की धुन जिसके तुल्य कोइ भी नहीं है, का अभ्यास करें।
(क्रमशः)

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