सोमवार, 20 अप्रैल 2020

*४. विरह कौ अंग ~ ११३/११६*

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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ ११३/११६*
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बिरह बोलि तन बिसतरै, बाणी सुनि समाइ ।
कहि जगजीवन सहज घरि, आनंद अंग न समाइ ॥११३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जीवात्मा की विरह रुपी बेल शरीर रुपी भूमि पर फैल रही है । प्रभु नाम को सुन कर वह स्थिर हो गयी है विरह शांत हो गया है वह अब परमात्मा के मिलन से सहज रुप से जीवात्मा अपने देह रुपी घर में आनंद से खिल रही है।
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कहि जगजीवन दरदवंद, दम गहि राखै ठांम ।
जातन करै उस जांम१ का, मूल भगति जिंहिं नांम ॥११४॥
{१. जांम-याम प्रहर(समयविशेष)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिसे परमात्मा के विरह का दर्द है वह जीवात्मा अपने श्वास स्थिर रखते हैं वे उस समय को यत्नपूर्वक सहेजते हैं जिस पहर में प्रभु सिमरण होता है।
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व्रतधारी हरि क्रित करै, अंदर बिरह जगाइ ।
कहि जगजीवन समिध अग्नि ज्यूँ, राखै अस्त लगाइ ॥११५॥ 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो परमात्मा के नियमानुसार चलते हैं वे जन परमात्मा के विरह को बनाये रखते हैं। वे विरह अग्नि उसी प्रकार रखते हैं जैसे राख अपने अन्तर में अग्नि रखे रखती है।
दरद देह चौसर चलै, घाइल रांम समाइ ।
कहि जगजीवन नां जिवै, जीवै तो पिव पाइ ॥११६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि देह में दर्द शतरंज की भांति अपनी चाल चलता रहता है और राम नाम के विरह से घायल वह उनमें समा जाता है। जब जीव अपने आप को मिटा लेता है तभी वह उस प्रभु को पाता है।
(क्रमशः)

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