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*हरि जल नीर निकट जब आया,*
*तब बूँद बूँद मिल सहज समाया ॥*
*नाना भेद भ्रम सब भागा,*
*तब दादू एक रंगै रंग लागा ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ६४)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(शिवनाथ से)- “तुम्हें देखने को जी चाहता है । शुद्धात्माओं को बिना देखे किसको लेकर रहूँगा? शुद्धात्मा पिछले जन्म के मित्र जान पड़ते हैं ।”
एक ब्राह्मभक्त ने पूछा, - “महाराज, आप जन्मातर मानते हैं?”
जन्मान्तर-“बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि त्व चार्जुन”
श्रीरामकृष्ण- हाँ, मैंने सुना है कि जन्मान्तर होता है । ईश्वर का काम हम लोग अल्पबुद्धि से कैसे समझ सकते हैं? अनेकों ने कहा है, इसलिए अविश्वास नहीं कर सकते । भीष्मदेव देह छोड़ना चाहते हैं, शरों की शय्या पर लेटे हुए हैं; सब पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ खड़े हैं ।
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सब ने देखा, भीष्मदेव की आँखों से आँसू बह रहे हैं । अर्जुन श्रीकृष्ण से बोले, ‘भाई, यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि पितामह-जो स्वयं भीष्मदेव ही हैं; सत्यवादी, जितेन्द्रिय, ज्ञानी, आठों वसुओ में से एक हैं-वे भी देह छोड़ते समय माया में पड़े रो रहे हैं ।’ यह भीष्मदेव से जब कृष्ण ने कहा तब वे बोले, ‘कृष्ण’, तुम खूब जानते हो कि मैं इसलिए नहीं रो रहा हूँ । जब सोचता हूँ कि स्वयं भगवान् पाण्डवों के सारथि हैं, फिर भी उनके दुःख और विपत्तियों का अन्त नहीं होता तब यही याद करके आँसू बहाता हूँ कि परमात्मा के कार्यों का कुछ भी भेद न पाया ।’
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*भक्तों के साथ कीर्तनानन्द*
समाजगृह में संध्याकाल की उपासना शुरू हुई । रात के साढ़े आठ बजे का समय है । चाँदनी रात है । बगीचे के वृक्ष, लताएँ, कुंज आदि शरत्कालीन चन्द्रमा की निर्मल किरणों में आप्लावित हो उठे । समाजगृह में संकीर्तन हो रहा है । श्रीरामकृष्ण भगवत्प्रेम से मतवाले होकर नाच रहे हैं । ब्राह्म भक्तगण मृदंग-करताल लेकर, उन्हें घेरकर नाच रहे हैं । भाव में भरे सभी मानो ईश्वर-दर्शन कर रहे हैं । हरिनाम-ध्वनि उत्तरोत्तर बढ़ने लगी ।
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*पहले साधना, बाद में संसार । अभ्यासयोग ।*
श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, “देखो, मेम कैसे एक पैर के सहारे घोड़े पर खड़ी है और घोड़ा तेजी से दौड़ रहा है । कितना कठिन काम है ! अनेक दिनों तक अभ्यास किया है, तब तो ऐसा सीखा । जरा असावधान होते ही हाथ-पैर टूट जाएँगे और मृत्यु भी हो सकती है । संसार करना इसी प्रकार कठिन है । बहुत साधन-भजन करने के बाद ईश्वर की कृपा से कोई कोई इसमें सफल हुए हैं । अधिकांश लोग असफल हो जाते हैं । संसार करने जाकर और बद्ध हो जाते हैं, और भी डूब जाते हैं-मृत्यु-यन्त्रणा होती है ! जनक आदि की तरह किसी किसी ने उग्र तपस्या के बल पर संसार किया था । इसलिए साधन-भजन की विशेष आवश्यता है । नहीं तो संसार में ठीक नहीं रहा जा सकता ।”
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*बलराम के मकान पर श्रीरामकृष्ण*
श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठे । गाड़ी बागबाजार के बसुपाड़ा में बलराम के मकान के दरवाजे पर आ खड़ी हुई । श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दुमँजले पर बैठक घर में जा बैठे । सायंकाल है- दीया जलाया गया है । श्रीरामकृष्ण सर्कस की बातें कर रहे हैं । अनेक भक्त एकत्रित हुए हैं । उनके साथ ईश्वर-सम्बन्धी चर्चा हो रही है । मुख में दूसरी कोई भी बात नहीं है, केवल ईश्वर की बात ।
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*जातिभेद तथा अस्पृश्यों की समस्या*
जातिभेद के सम्बन्ध में चर्चा चली ।
भक्ति होने से ही देह, मन, आत्मा सब शुद्ध हो जाते हैं । गौर निताई हरिनाम देने लगे और चाण्डाल तक सभी को गोद में लेने लगे । भक्ति न रहने पर ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है । भक्ति रहने पर चाण्डाल चाण्डाल नहीं है । अस्पृश्य जाति भक्ति के होने पर शुद्ध पवित्र हो जाती है ।
(क्रमशः)

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