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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
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*॥ कर्तूति कर्म ॥*
*राहु गिलै ज्यों चंद को, ग्रहण गिलै ज्यों सूर ।*
*कर्म गिलै यों जीव को, नख-सिख लागै पूर ॥५६॥*
*दादू चन्द्र गिलै जब राहु को, ग्रहण गिलै जब सूर ।*
*जीव गिलै जब कर्म को, राम रह्या भरपूर ॥५७॥*
जैसे आकाश में स्थित सूर्य चन्द्रमा को राहु केतु ग्रसते हैं । यह उनके पाप का फल है । इसी तरह मन रूपी चन्द्रमा भी पापमय कर्मों से ग्रस्त होकर निस्तेज हो जाता है । उस समय यह जीव पापमय कर्मों के द्वारा लिप्त होकर भगवान् का स्मरण नहीं करता किन्तु पापमय कर्मों में ही आसक्त होकर संसार में नानाविध क्लेशों को भोगता है । ज्ञानाग्नि से तो सारे कर्म भस्म हो जाते हैं । इसलिये कर्मों को नष्ट करने के लिए ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र साधन नहीं है । अतः कर्मपाश से मुक्त होने के लिये ज्ञान की परम आवश्यकता है । जैसे ग्रहण के समाप्त होने पर सूर्यचन्द्रमा निर्मल हो जाते हैं ऐसे ही ज्ञान से कर्म क्षय होने पर जीव भी ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है ।
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*कर्म कुहाड़ा अंग वन, काटत बारंबार ।*
*अपने हाथों आप को, काटत है संसार ॥५८॥*
यह जीवात्मा स्वयं कर्मरूपी कुठार(फरसा) से अपने आप को काट रहा है । स्वयं ही पाप पुण्य करके उनके फलों को भोगने के लिये संसार में उत्पन्न होता है, और बार-बार मरता है ।
महाभारत में- यह जीव स्वयं ही पैदा होकर वृद्धि को प्राप्त होता है तथा स्वयं ही सुख दुःख और मृत्यु को प्राप्त होता है । हे राजन् ! यह जीव निरन्तर पाप-पुण्य या मिश्रित(दोनों मिले हुए) कर्मों के फलों को भोगता हुआ पाप-पुण्यकर्मों को करता रहता है । क्योंकि बिना भोगे कर्मों का नाश नहीं होता । इस संसार में कष्ट भोगता हुआ प्राणी जब तक दुःखों को भोगकर समाप्त नहीं कर देता तब तक पुण्य-कर्म कूटस्थ की तरह(फल न देता हुआ) स्थित रहता है जब दुःखों को भोग कर समाप्त कर देता है । तब पुण्य कर्म के फल को भोगता है । पुण्यकर्म के फल को भोगकर जब उसको समाप्त कर देता है तब फिर पापकर्म भोगता है । इस प्रकार पाप पुण्यकर्मों के फल भी नियत नहीं है । कभी पहले पाप बाद में पुण्य या कभी पहले पुण्य और बाद में पाप को भोगता है । अतः बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपने मन को मारकर परमात्मा में लगाये रखना चाहिये ।
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*॥ स्वकीय मित्र शत्रुता ॥*
*आपै मारै आप कौं, यहु जीव बिचारा ।*
*साहिब राखणहार है, सो हितू हमारा ॥५९॥*
*आपै मारै आपकौं, आप आपकौं, खाइ ।*
*आपै अपणा काल है, दादू कहै समझाइ ॥६०॥*
परमात्मा सबका रक्षक और मित्र है । क्योंकि गीता में परमात्मा को सबको सुहृद बतलाया है । किन्तु जीव स्वयं ही अविद्या के कारण निषिद्धाचरण द्वारा पतित हो जाता है । दुर्वासनाओं से प्रेरित होकर काम क्रोध के द्वारा स्वयं ही दुःखी होता है । अतः वह अपने आपका स्वयं ही शत्रु है तथा साधना के द्वारा यदि अपना उद्धार करता है तो वह अपना मित्र है । स्वयं ही अपना काल है और स्वयं ही अपने सुखदुःखादि को भोगता है ।
लिखा है कि- मनुष्य को सुख दुःख देने वाला अन्य कोई भी नहीं है । स्वयं ही अपने भ्रम से शत्रु मित्र उदासीन की अपने अज्ञान से कल्पना कर लेता है । जिसने अपनी आत्मा से अपनी आत्मा को जीत लिया उसके लिये वह आत्मा ही उसका बन्धु है । जो अनात्मा है उसके लिए वह अनात्मा ही शत्रु की तरह हो जाती है ।
इस संसार रूपी कुहर(अन्धकार)से स्वयं ही पुरुषार्थ करके अपने आपको अलग कर लेना चाहिये । जैसे सिंह पुरुषार्थ करके स्वयं ही पिंजरे से बाहर आ जाता है ।
(क्रमशः)

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