शनिवार, 18 अप्रैल 2020

= २४७ =

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग सिन्दूरा १०(गायन समय रात्रि १२ से ३)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
२४७ - झपताल
सुख सागर में झूलबो, कश्मल झड़ै हो अपार ।
निर्मल प्राणी होइबो, मिलिबोल सिरजनहार ॥टेक॥
तिहिँ सँजम पावन सदा, पँक न लागे प्राण ।
कमल विगासै तिहिं तचरणों, उपजै ब्रह्म गियान ॥१॥
अगम निगम तहँ गम करै, तत्वैं तत्व मिलान ।
आसन गुरु के आइबो, मुक्तैं महल समान ॥२॥
प्राणी परि पूजा करै, पूरै प्रेम विलास ।
सहजैं सुन्दर सेविये, लागी लै कैलास ॥३॥
रैण दिवस दीसै नहीं, सहजैं पुँज प्रकास ।
दादू दर्शन देखिये, इहि रस रातो हो दास ॥४॥
भगवद् भजन रूप सुख - सागर में स्नान करने से अपार पाप नष्ट हो जाते हैं । प्राणी निर्मल होकर सृष्टि - कर्ता ईश्वर से मिलता है । 
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सँयम पूर्वक भजन से प्राणी सदा के लिये अन्यों को पवित्र करने वाला बन जाता है और उसके कोई भी प्रकार का दोष रूप कीचड़ नहीं लगता । उसका हृदय - कमल खिल जाता है, उसमें ब्रह्म ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । 
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वेद से भी जो अगम है, उस ब्रह्म के पास पहुंच जाता है और ब्रह्म तत्व में आत्मतत्व को मिलाकर गुरु के बताये हुये स्वस्वरूप स्थिति रूप आसन पर स्थिर हो, शरीर - महल में रहते हुये भी शरीर से मुक्त के समान हो जाता है । 
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प्राणी परिपूर्ण रूप से प्रभु की पूजा करता है, तब शनै: शनै: उस सुन्दर सेवा से उसकी वृत्ति सहस्रार रूप कैलास में जाकर ब्रह्म - स्वरूप में लगती है और वह प्रभु के पूर्ण परमानन्द का उपभोग करता है । 
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समाधि में जहां प्रभु का दर्शन होता है, वहां रात्रि - दिन आदि काल - भेद नहीं दीखता, स्वाभाविक प्रकाश पुँज ब्रह्म ही भासता है । हे भगवान् के दास ! तू भी इस भजन - रस में अनुरक्त होकर उस परब्रह्म के दर्शन कर ।
(क्रमशः)

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