शनिवार, 18 अप्रैल 2020

*कालीरूप तथा श्यामरूप की व्याख्या*


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*प्राण न पिंड, रूप नहिं रेखा,*
*सोइ तत्त सार नैन बिन देखा ॥*
*जोग न भोग, मोह नहिं माया,*
*दादू देख काल नहिं काया ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २४०)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*

साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*कालीरूप तथा श्यामरूप की व्याख्या* 
“वेदान्त-विचार के सामने नाम-रूप कुछ नहीं ठहरते । उस विचार का चरम सिद्धांत है- ‘ब्रह्म सत्य और नामरूपोंवाला संसार मिथ्या ।’ जब तक ‘मैं भक्त हूँ’ यह अभिमान रहता है, तभी तक ईश्वर का रूप दिखायी देना और ईश्वर के सम्बन्ध में व्यक्ति(Person) का बोध रहना सम्भव है । विचार की दृष्टि से देखें तो भक्त के ‘मैं भक्त हूँ’ इस अभिमान ने उसे कुछ दूर तक रखा है ।”
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“कालीरूप या श्यामरूप साढ़े तीन हाथ का इसलिए है कि वह दूर है । दूर होने के कारण सूर्य छोटा दीखता है । पास जाओ तो इतना बड़ा मालुम होगा कि उसकी धारणा ही न कर सकोगे । और फिर कालीरूप या श्यामरूप श्यामवर्ण क्यों है? –क्योंकि वह भी दूर है । सरोवर का जल दूर से हरा, नीला या काला दीख पड़ता है; निकट जाकर हाथ में लेकर देखो, कोई रंग नहीं । आकाश दूर ही से नीला दिखायी देता है, पास जाकर देखो तो कोई रंग नहीं ।”
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“इसलिए कहता हूँ, वेदान्त-दर्शन के विचार से ब्रह्म निर्गुण है । उनका स्वरूप क्या है, यह मुँह से नहीं कहा जा सकता । परन्तु जब तक तुम स्वयं सत्य हो तब तक संसार भी सत्य है, ईश्वर के नामरूप भी सत्य हैं, ईश्वर को एक व्यक्ति समझना भी सत्य है ।”
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“तुम्हारा मार्ग भक्तिमार्ग है । यह बड़ा अच्छा है, सरल मार्ग है । अनन्त ईश्वर समझ में थोड़े ही आ सकते हैं? और उन्हें समझने की जरूरत भी क्या? यह दुर्लभ मनुष्यजन्म प्राप्त कर हमें वह करना चाहिए जिससे उनके चरण-कमलों में भक्ति हो ।”
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“यदि लोटेभर पानी से हमारी प्यास बुझे तो तालाब में कितना पानी है, इसकी नापतौल करने की क्या जरूरत? अगर अद्धेभर शराब से हम मस्त हो जायँ तो कलवार की दुकान में कितने मन शराब है, इसकी जाँच-पड़ताल करने का क्या काम? अनन्त का ज्ञान प्राप्त करने का क्या प्रयोजन?”
(क्रमशः)

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