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*जब अंतर उरझ्या एक सौं, तब थाके सकल उपाइ ।*
*दादू निश्चल थिर भया, तब चलि कहीं न जाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*विश्वास संतोष का अंग ११२*
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जन रज्जब जीव सब तज्या, जब मनसा धरी धोय ।
भूति भार भासै नहीं, करता करै सु होय ॥८१॥
जब बुद्धि के विकार धोकर उसे ब्रह्म के स्वरूप में स्थिर कर दिया, तब जीव ने सर्व त्याग कर दिया, ऐसा ही समझना चाहिये । सर्व त्याग के पश्चात उसके हृदय पर माया का बोझा नहीं दिखता और जीवन निर्वाह जैसे ईश्वर करता है वैसा ही होता है ।
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रज्जब आशा मैल मन, निर्मल सदा निराश ।
आगे खुशी खुदाय की, यहु वेत्ता१ विश्वास ॥८२॥
आशा से मन मलिन रहता है, आशा रहित का मन सदा निर्मल रहता है, मन को निर्मल बनाने के पश्चात ईश्वर की जैसे इच्छा होती है उसी ढंग से वह अपना साक्षात्कार करता है । यही ज्ञानियों१ का विश्वास है ।
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जे कोई धुरि उठाईले, धरती धोखा१ नाँहिं ।
जानै कित२ ले जायगा, मेरी मुझ ही माँहि ॥८३॥
यदि कोई धुलि उठाले तो पृथ्वी को उससे कोई भ्रम१ नहीं होता, वह जानती है कि इसे यह कहाँ२ ले जायगा ? जहाँ पटकेगा वहाँ मेरी मेरे में ही मिलेगी ।
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रज्जब रिधि१ रज एक है, वसुधा२ में विश्वास ।
विभूति३ भूत को ले चलै, धर्या४ धरे५ के पास ॥८४॥
माया१ रज और विश्वास एक समान ही हैं, जैसे माया प्राणी को मायिक संसार में ले जाती है और रज के साथ उड़े हुये भूसा के कण को रज पृथ्वी२ पर ही ले जाती है, वैसे ही मायिक३ विश्वास प्राणी को माया४ के पास ले जाता है अर्थात सगुण५ के पास ले जाता है निर्गुण ब्रह्म का विश्वास निर्गुण ब्रह्म में मिलता है ।
(क्रमशः)

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