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*देबे की सब भूख है, लेबे की कुछ नांहि ।*
*सांई मेरे सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *आत्म निवेदन भक्ति*
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मामा और भानजा दो भक्त थे । तीर्थ यात्रा करने निकले थे । एक वन में भगवान का मंदिर रहित मूर्ति देख कर उसका मंदिर बनाने का निश्चय करके धन की खोज करने लगे । एक नगर में जैन मंदिर की मूर्ति पारस की सुन कर उसी मंदिर में जाकर शिष्य बन गये । उनकी सेवा से प्रसन्न होकर मंदिर का सब कार्य उन्हीं के हाथ में दे दिया मूर्ति को ले जाने के लिये अन्य मार्ग नहीं देख करके कलश का पेच खोल करके मामा ने मूर्ति को रस्सियो से बांध दिया और भानजे ने उपर खींच ली । मामा भी उसी मार्ग से निकलने लगा किन्तु उस छेद में ही फंस गया । जब बहुत यत्न करने पर भी नहीं निकल सका तब मामा ने कहा - तू मेरा सिर काट ले जा धड़ को यही ही पड़ा रहने दे और जाकर इच्छा अनुसार भगवत् का मंदिर बनवा । भानजे ने वैसा ही किया ।
जब भानजा मूर्ति वाले वन में पहुंचा तो देखा के कोई मंदिर बनवाने की तैयारी कर रहा है । इससे उसे कुछ दुख हुआ किन्तु आगे जाकर देखा तो अपना मामा ही खड़ा है । आनंद के साथ दोनों मिले और फिर पारस मूर्ति से सोना बना-बनाकर श्री रंगनाथजी का विशाल मंदिर बनवाया जो अनुपम है । इससे सूचित होता है कि आत्म निवेदक की इच्छा अपूर्ण नहीं रहती ।
आत्मनिवेदक की नहीं, इच्छा से रहे अपूर्ण ।
हरि मंदिर हित तन दिया, मामा जीया तूर्ण ॥१९२॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

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