मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

= २५० =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग सिन्दूरा १०(गायन समय रात्रि १२ से ३)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
२५० - शूरातन । झपताल
क्यों भाजै सेवक तेरा, ऐसा शिर साहिब मेरा ॥टेक॥
जाके धरती गगन अकाशा, जाके चँद सूर कविलाशा ।
जाके तेज पवन जल साजा, जाके पँच तत्व के बाजा ॥१॥
जाके अठारह भार वनमाला, गिरि पर्वत दीन दयाला ।
जाके सायर१ अनन्त तरँगा, जाके चौरासी लख संगा ॥२॥
जाके ऐसे लोक अनन्ता, रचि राखै विधि बहु भँता ।
जाके ऐसा खेल पसारा, सब देखे कौतुकहारा ॥३॥
जाके काल मीच डर नाँहीं, सो बरत रह्या सब माँहीं ।
मन भावै खेल ह्वै खेला, ऐसा है आप अकेला ॥४॥
जाके ब्रह्मा ईश्वर२ बँदा, सब मुनिजन लागे अँगा ।
जाके साधु सिद्ध सब माँहीं, परिपूरण परिमित नाँहीं ॥५॥
सोइ भानै घड़े संवारै, युग केते कबहुं न हारै ।
ऐसा हरि साहिब पूरा, सब जीवन आत्म मेरा३ ॥६॥
सो सबहिन की सुधि जानैं, जो जैसा तैसी बानैं ।
सर्वंगी राम सयाना, हरि करै सो होइ निदाना ॥७॥
जे हरि जन सेवक भाजै, तो ऐसा साहिब लाजै ।
अब मरण मांड हरि आगे, तो दादू बाण न लागे ॥८॥
२५० - २५१ में साधन शौर्य दिखा रहे हैं - हे प्रभो ! आपका सेवक आपकी सेवा छोड़ कर, विषय - वासना की पूर्ति के लिए क्यों दौड़ेगा ? मेरे शिर पर आप ऐसे स्वामी हैं - 
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जिनने इच्छा मात्र से तन्मात्रा रूप पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश रचे हैं ओर आकाश में चन्द्र, सूर्यादि सजाये हैं जिनके स्थूल पँच भूतों के ध्वनि रूप शब्द ही बाजे बज रहे हैं । 
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जिन दीनदयालु ने अठारह भार वनस्पति के वनों की पँक्तियां, छोटे बड़े पर्वत, अनन्त तरँगों वाले समुद्र१ रचे हैं, चौरासी लक्ष योनि जिनके साथ हैं, ऐसे अनन्त लोकों की बहुत प्रकार से रचना करके भली भाँति रक्षा कर रहे हैं । 
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जिनका यह ऐसा विचित्र सँसार - खेल फैलाया हुआ है और वे खेल करने वाले के समान सबको देख रहे हैं । 
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जिन को समय व्यतीत होने का वो मृत्यु का भय नहीं है, वे सब में स्थित रह कर उनके मन को अच्छा लगे वैसा खेल खेलते हैं । 
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वे ऐसे अद्भुत और स्वयँ अद्वैत हैं । जिनके ब्रह्मा और महादेव२ भी भक्त हैं । सभी मुनिजन, साधु और सिद्ध भी जिनके स्वरूप चिन्तन में लगे हैं । जो सब में परिपूर्ण और असीम हैं । 
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वे ही अनन्त नारी पुरुषादिक जोड़े निरँतर बनाते हैं और नष्ट करते रहते हैं, किन्तु कभी भी थकते नहीं । वे हरि ऐसे पूर्ण प्रभु हैं, सँपूर्ण जीवात्माओं के मूल३ और जीवन हैँ । 
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वे सबके भाव विचारों को जानते हैं और जो जैसा होता है, उसके लिये वैसी ही व्यवस्था बना देते हैं । वे राम सँपूर्ण जीवादि रूप अँगों के अँगी हैं अर्थात् सर्व रूप हैं और परम चतुर हैं । जो भी वे हरि करना चाहते हैं, अंत में वही होता है । 
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यदि हरि का सेवक, हरि उपासना को छोड़ कर विषय - वासना पूर्ति के लिए दौड़ता है तो ऐसे प्रभु को लाज लगती है । इस लिये अब मरना स्वीकार करके भी भजन द्वारा हरि के आगे ही रहना चाहिए । ऐसा करने से काल - कर्म के बाण न लग सकेंगे और अन्त में साधक अभेद रूप से हरि को ही प्राप्त होगा ।
(क्रमशः)

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