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*दादू रोजी राम है, राजिक रिजक हमार ।*
*दादू उस प्रसाद सौं, पोष्या सब परिवार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*अचिंत विश्वास का अंग ११३*
इस अंग में चिंता रहित विश्वास का विचार कर रहे हैं ~
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वैराग१ विश्वंभर परि मंड्या२, करि चिंता चित नाश ।
विहंग बोझ न विहंग३ शिर, देखे उङत अकाश ॥१॥
खान - पानादि की चिंता को चित्त से हटाकर विरक्त१ जन विश्व का भरण-पोषण करने वाले प्रभु के स्वरूप में ही अनुरक्त२ रहते हैं । जैसे आकाश में उङते हुये पक्षी का बोझ दूसरे पक्षी३ के शिर नहीं होता, वैसे ही एक जीव का भार दूसरे जीव पर नहीं पङता ।
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उडग१ अतीत२ अकाश आश बिन, भार न काहू देहि ।
रज्जब मिले असंख्य एकठे, रिजक३ राम पहिं लेहि ॥२॥
आकाश में असंख्यक तारे१ हैं किन्तु किसी पर भी उनका भार नहीं है, वैसे ही आशा रहित गुणातीत२ संत का बोझ किसी पर भी नहीं होता । ऐसे असंख्य संत इकट्ठे हो जाय तो भी राम से ही जीविका३ लेते हैं ।
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वैराग२ सु बादल सम सदा, सकल अधर१ व्यवहार ।
लागे सांई शून्य सौं, भूत३ हि देहि न भार ॥३॥
विरक्त२ सदा बादल के समान अधर रहते हैं, उनका सभी व्यवहार ब्रह्म१ प्राप्ति के लिये ही होता है । वे निर्विकार ब्रह्म के चिन्तन में ही लगे रहते हैं । किसी प्राणी२ के लिये भाररूप नहीं होते ।
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अठार१ भार इक अवनि पर, त्यों आतम अविगत्ति२ ।
यूं रज्जब चिन्ता उठी, जब आई यहु मत्ति ॥४॥
अठारह१ भार वनस्पति एक ही पृथ्वी पर है, वैसे ही सभी जीवात्मायें एक ब्रह्म२ में है, इस प्रकार बुद्धि जब आई है तब हृदय से चिंता उठ गई है ।
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जल निधि में जलचर विविध, पै का१ शिर का२ बोझ ।
त्यों रज्जब सब राम परि, समझै नहीं सु रोझ ॥५॥
समुद्र में नाना प्रकार के जल जन्तु हैं किन्तु किसके१ शिर पर किसका२ भार है वैसे ही सब जीवों के भरण-पोषण का भार राम पर है यह रहस्य नहीं समझते वे वन के रोझ पशु के तुल्य हैं ।
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रे रज्जब राकेश१ कन२, सदा सु मण्डल तार ।
किसकी चिन्ता कौन को, किसका किस पर भार ॥६॥
चन्द्रमा१ के पास२ सदा तारा मण्डल रहता है किन्तु किसकी किसको चिन्ता है ? और किसका किस पर बोझ है ? वैसे ही किसी का भी किसी पर भार नहीं है, जीवों के प्रारब्धानुसार भगवान सब का भरण-पोषण करते हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित अचिंत विश्वास का अंग ११३ समाप्तः ॥सा. ३५०१॥
(क्रमशः)

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