सोमवार, 6 अप्रैल 2020

*३. नांम कौ अंग ~ २०५/८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*३. नांम कौ अंग ~ २०५/८*
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तुम्हरा ही गुणानुवाद हरि, सब कोइ गावै रांम ।
कहि जगजीवन सोइ धरि लाधै२, भगति अखंडित नांम ॥२०५॥
(२. लाधै-प्राप्त हो)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे ईश्वर आपके ही गुण सब राम नाम स्मरण द्वारा गाते हैं और जो गाते हैं वे ही अखण्डित प्रभु भक्ति प्राप्त करते हैं।
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नांम सुणावौ आपणां, दिक्ष्या दीज्यौ मोहि ।
कहि जगजीवन रांमजी, सतगुरु समझूं तोहि ॥२०६॥
संतजगजीवन जी कहते है कि है प्रभो आप नाम दान देकर मुझे दीक्षित करने की कृपा करें तो, हे राम जी मैं तो आपको ही अपना सद्गुरु मानूं क्योंकि आपका नाम ही सद्गुरु की भांति सब कुछ देनेवाला है।
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नांम सुणावौ आपणां, हम जीवैं तिहिं लागि ।
कहि जगजीवन रांमजी, अधिक विरह की आगि ॥२०७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ईश्वर हमें अपने नाम की कृपा बख्शें हम उसी के सहारे जीते हैं ईश्वर हमें आपके नाम का ही विरह है आप अपनी कृपा से हमारे विरह की अग्नि को शांत करें।
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नांम सुणावौ आपणां, जहां लग है हरि आदि ।
कहि जगजीवन रांमजी, रसनां गावै स्वादि ॥२०८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि है प्रभु जी आप अपने नाम की महत्ता का महत्व आदि से ही बतायें जिसे ज्ञान होने पर ये जिह्वा आनंद रुपी स्वाद से गायेगी।
(क्रमशः)

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