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*बरषहु राम सदा सुख अमृत,*
*नीझर निर्मल धारा ।*
*प्रेम पियाला भर भर दीजे,*
*दादू दास तुम्हारा ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. १४५)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*७२. क़ाज़ी की शरणागति*
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सब लोगों के यथायोग्य खड़े हो जाने पर प्रभु ने नूपुर बजाकर इशारा किया। बस, प्रभु का संकेत पाना था कि ढोल-करतालों की मधुर ध्वनि से आकाश मण्डल गूंजने लगा। प्रेम-वारुणी में पागल-से बने हुए भक्त ताल-स्वर के सहित गा-गाकर नृत्य करने लगे।
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उस समय किसी को न तो अपने शरीर की सुधि रही और न बाह्य जगत का ही ज्ञान रहा। जिस प्रकार भूत-पिशाच से पकड़े जाने वाले मनुष्य होश-हवास भुलाकर नाचने-कूदने लगते हैं, उसी प्रकार भक्तगण प्रेम में विभोर होकर नृत्य करने लगे, किंतु कोई भी ताल-स्वर के विपरीत नहीं जाता था।
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इतने भारी कोलाहल में भी सभी ताल-स्वर के नियमों का भलीभाँति पालन कर रहे थे। सभी के पैर एक साथ ही उठते थे। घुँघरुओं की रुनझुन-रुनझुन ध्वनि के साथ ढोल-करताल और झाँझ-मजीरों की आवाजें मिलकर विचित्र प्रकार की ही स्वर-लहरी की सृष्टि कर रही थीं।
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एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय से बिलकुल पृथक ही पदों का गायन करता था। वाद्य बजाने वाले भक्त नृत्य करते-करते बाद्य बजा रहे थे। ढोल बजाने वाले बजाते-बजाते दोहरे हो जाते और पृथ्वी पर लेट-लेटकर ढोल बजाने लगते। करताल बजाने वाले चारों ओर हाथ फेंक-फेंककर जोरों से करताल बजाते।
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झाँझ और मजीरा की मीठी-मीठी ध्वनि सभी के हृदयों में खलबली-सी उत्पन्न कर रही थी। नृत्य करने वाले के चारों ओर से घेरकर भक्त खडे़ हो जाते और वह स्वच्छन्द रीति से अनेक प्रकार के कीर्तन के भावों को दर्शाता हुआ नृत्य करने लगता। उसके सम्प्रदाय के सभी भक्त उसके पैरों के साथ पैर उठाते और उसकी नूपुर-ध्वनि के सहित अपनी नूपुर-ध्वनि को मिला देते।
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बीच-बीच में सम्पूर्ण लोग एक साथ जोरों से बोल उठते ‘हरि बोल,’ ‘हरि बोल’,’गौरहरि बोल।’ अपार भीड़ में से उठी हुई यह आकाश-मण्डल को कपाँ देने वाली ध्वनि बहुत देर तक अन्तरिक्ष में गूजंती रहती। भक्त फिर उसी प्रकार संकीर्तन में मग्न हो जाते।
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सबसे पीछे नित्यानन्द और गदाधर के साथ प्रभु नृत्य कर रहे थे। महाप्रभु का आज का नृत्य देखने ही योग्य था। मानो आकाश-मण्डल में देवगण अपने-अपने विमानों में बैठे हुए प्रभु का नृत्य देख रहे हों। प्रभु उस समय भावावेश में आकर नृत्य कर रहे थे।
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घुंटुनों तक लटकी हुई उनकी मनोहर माला पृथ्वी को स्पर्श करने लगती। कमर को लचाकर, हाथों को उठाकर, ऊर्ध्व दृष्टि किये हुए प्रभु नृत्य कर रहे थे। उनके दोनों कमल-नयनों से प्रेमाश्रु बह-बहकर कपोलों के ऊपर से लुढ़क रहे थे।
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प्रभु उन्मत्त हुए नृत्य कर रहे थे। उन्हें बाह्य-जगत का कुछ पता ही नहीं था। सभी संसारी विषयों का चिन्तन छोड़कर संकीर्तन की प्रेम-धारा में वे बहने लगे। उन्हें न तो क़ाज़ी का पता रहा और न उसके अत्याचारों का ही। सभी प्रभु के नृत्य को देखकर आपा भूले हुए थे।
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इस प्रकार का नगर-कीर्तन यह सबसे पहला ही था। सभी के लिये यह नयी बात थी, फिर मुसलमान शासक के शासन में ऐसा करने की हिम्मत ही किसकी हो सकती थी? किंतु आज तो प्रभु के प्रभाव से सभी अपने को स्वतन्त्र समझने लगे थे। उनके हृदयों पर तो एक मात्र प्रभु का साम्राज्य था, वे उनके तनिक-से इशारे पर सिर कटाने तक को तैयार थे।
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तिरछी आँखों की कोरों में से शीतल अश्रुओं के कण बह-बहकर जब कपोलों पर कढ़ी हुई पत्रावली के ऊपर होकर नीचे गिरते तब उस समय के मुख-मण्डल की शोभा देखते ही बनती थी। वे गद्गद कण्ठ से गा रहे थे
‘तुम्हार चरण मन लागुरे,
हे सांरगधर’- सांरगधर
कहते-कहते प्रभु का गला भर आता और सभी भक्त एक स्वर में बोल उठते ‘हरि बोल’, ‘गौरहरि बोल’।
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प्रभु फिर संभल जाते और फिर उसी प्रकार कोकिल-कण्ठ से गान करने लगते। वे हाथ फैलाकर, कमर लचाकर, भौहें मरोड़कर, सिर को नीचा-ऊंचा करके भाँति-भाँति से अलौकिक भावों को प्रदर्शित करते। सभी दर्शक काठकी पुतलियों के समान प्रभु के मुख की ओर देखते-के-देखते ही रह जाते। प्रभु के आज के नृत्य से कठोर-से-कठोर हृदय में भी प्रेम का संचार होने लगा।
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कीर्तन के महाविरोधियों के मुखों में से भी हठात निकल पड़ने लगा- ‘धन्य है, प्रेम हो तो ऐसा हो !’ कोई कहता- ‘इतनी तन्मयता तो मनुष्य-शरीर में सम्भव नहीं।’ दूसरा बोल उठता- ‘निमाई तो साक्षात नारायण है।’ कोई कहता- ‘हमने तो ऐसा सुख अपने जीवन में आज तक कभी पाया नहीं।’ दूसरा जल्दी से बोल उठता- ‘तुमने क्या, किसी ने भी ऐसा सुख आज तक कभी नहीं पाया। यह सुख तो देवताओं को भी दुर्लभ है। वे भी इसके लिये सदा लालायित बने रहते हैं।’
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प्रभु संकीर्तन करते हुए गंगा जी के घाट की ओर जा रहे थे। रास्ते में मनुष्यों की अपार भीड़ थी। उस भीड़ में से चींटी का भी निकल जाना सम्भव नहीं था। भगवद्भक्त सद्गृहस्थ अपने-अपने दरवाजों पर आरती लिये हुए खडे़ थे। कोई प्रभु के ऊपर पुष्पों की वर्षा करता, कोई भक्तों को माला पहनाता, कोई बहुमूल्य इत्र-फुलेल की शीशी-की-शीशी प्रभु के ऊपर उडे़ल देता। कोई इत्रदान में से इत्र छिड़क-छिड़ककर भक्तों को सराबोर कर देता।
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अटा, अटारी और छज्जे तथा द्वारों पर खड़ी हुई स्त्रियाँ प्रभु के ऊपर वहीं से पुष्पों की वृष्टि करतीं। कुमारी कन्याएं अपने आंचलों में भर-भरकर धान के लावा भक्तों के ऊपर बिखेरती। कोई सुन्दर सुगन्धित चन्दन ही छिड़क देती, कोई अक्षत, दूब तथा पुष्पों को ही फेंककर भक्तों का स्वागत करती। इस प्रकार सम्पूर्ण पथ पुष्पमय हो गया। लावा, अक्षत, पुष्प और फलों से रास्ता पट-सा गया।
(क्रमशः)

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