सोमवार, 20 अप्रैल 2020

*समाधि होने पर कर्मत्याग*

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*शरण तुम्हारी अंतर वास,*
*चरण कमल तहँ देहु निवास ॥*
*अब दादू मन अनत न जाइ,*
*अंतर वेधि रह्यो ल्यौ लाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. १९)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*समाधि होने पर कर्मत्याग*
-पूर्वकथा-श्रीरामकृष्ण का तर्पणादि कर्मत्याग 
“मुझसे एक मनुष्य ने कहा था, ‘महाराज, मुझे आप समाधि सिखा सकते हैं?’ (सब हँसते हैं)
“समाधि होने पर सब कर्म छूट जाते हैं । पूजा-जपादि कर्म, विषय-कर्म सब छूट जाते हैं । पहले-पहल कामों की बड़ी रेलपेल होती है, परन्तु ईश्वर की ओर जितना ही बढ़ोगे, कामों का आडम्बर उतना ही घटता जाएगा; यहाँ तक कि नामगुणकीर्तन तक छूट जाता है । (शिवनाथ से) जब तक तुम सभा में नहीं आए कि तब तक तुम्हारे नाम और गुणों की बड़ी चर्चा चलती रही । ज्योंही तुम आए कि वे सब बातें बन्द हो गयीं । तब तुम्हारे दर्शन से ही आनन्द मिलने लगा । लोग कहने लगे, ‘यह लो, शिवनाथ बाबू आ गए ।’ फिर तुम्हारे बारे में और सब बातें बन्द हो जाती हैं ।
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“मेरी यह अवस्था होने पर गंगा में तर्पण करने के लिए जाकर मैंने देखा, उँगलियों के भीतर से पानी गिरा जा रहा है । तब हलधारी से रोते हुए पूछा, दादा, यह क्या हो गया ! हलधारी बोला, इसे ‘गलितहस्त’कहता हैं । ईश्वर दर्शन के बाद तर्पणादि कर्म नहीं रह जाते ।
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“संकीर्तन करते समय पहले कहते हैं, ‘निताई आमार माता हाथी !’ ‘नीति आमार माता हाथी ! ’ (मेरा नीति मतवाले हाथी की तरह नाच रहा है) भाव गहरा होने पर सिर्फ ‘हाथी हाथी’ कहते हैं । इसके बाद केवल ‘हाथी’ शब्द मुँह में लगा रहता है । अन्त को ‘हा’ कहते हुए भाव-समाधि होती है । तब वे जो अब तक कीर्तन कर रहे थे, चुप हो जाते हैं ।
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“जैसे ब्रह्मभोज में पहले खूब शोरगुल मचता है । जब सभी के आगे पत्तल पड़ जाती है तब गुलगपाड़ा बहुत-कुछ घट जाता है । केवल ‘पूड़ी लाओ, पूड़ी लाओ’ की आवाज होती रहती है । जब दही आया तब सप्-सप्(सब हँसते हैं ।) – शब्द मानो होता ही नहीं । और भोजन के बाद निद्रा । तब सब चुप !
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“इसीलिए कहा कि पहले-पहल कामों की बड़ी रेलपेल रहती है । ईश्वर के रास्ते पर जितना बढ़ोगे उतने ही कर्म घटते जायेंगे । अन्त को कर्म छूट जाते हैं । और समाधि होती है ।
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“गृहस्थ की बहू के गर्भवती होने पर उसकी सास काम घटा देती है । दसवें महीने में काम अक्सर नहीं करना पड़ता । लड़का होने पर उसका काम बिलकुल छूट जाता है । फिर वह सिर्फ लड़के की देखभाल में रहती है । घर-गृहस्थी का काम सास, ननद, जेठानी ये ही सब करती हैं ।
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*समाधि के बाद लोकशिक्षा*
“समाधिस्थ होने के बाद प्रायः शरीर नहीं रहता । किसी किसी का शरीर लोक-शिक्षण के लिए रह जाता है, - जैसे नारदादिकों का और चैतन्य जैसे अवतारपुरुषों का । कुआँ खुद जाने पर कोई कोई झौवा कुदाल फेंक देते हैं । कोई कोई रख लेते हैं, -सोचते हैं, शायद पड़ोस में किसी दूसरे को जरूरत पड़े । इसी प्रकार महापुरुष जीवों का दुःख देखकर विकल हो जाते हैं । ये स्वार्थी नहीं होते कि अपने ही ज्ञान से मतलब रखें । स्वार्थी लोगों की कथा तो जानते हो । कटी उँगली पर भी नहीं मूतते कि कहीं दूसरे का उपकार न हो जाय । (सब हँसे ।) एक पैसे की बर्फी दुकान से ले आने को कहो तो उसमें से भी कुछ साफ कर जायेंगे । (सब हँसते हैं ।)
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“परन्तु शक्ति की विशेषता होती है । छोटा आधार(साधारण मनुष्य) लोकशिक्षा देते डरता है । सड़ी लकड़ी खुद तो किसी तरह बह जाती है; परन्तु एक चिड़िया के बैठने से भी वह डूब जाती है । नारदादि ‘बहादुरी’ लकड़ी है । ऐसे लकड़ी खुद भी बहती है और कितने ही मनुष्यों, मवेशियों, यहाँ तक कि हाथी को भी अपने ऊपर लेकर बह जाती है ।”
(क्रमशः)

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