सोमवार, 20 अप्रैल 2020

माया का अंग ४९/५१

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
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*॥ विरक्तता ॥* 
*माया मगहर खेत खर, सद्गति कदे न होइ ।* 
*जे बंचे ते देवता, राम सरीखे सोइ ॥४९॥* 
काशी नगरी के समीप कुछ ही दूरी पर एक स्थान है, जहां पर वेदव्यासजी ने तप किया था । तप के बाद काशी को छोड़कर जो यहां पर मरेगा तो वह मुक्त हो जायेगा । ऐसा वरदान दे दिया था । जब शंकर भगवान् को मालुम हुआ तो उन्होंने उस क्षेत्र को शाप दे दिया कि जो यहां मरेगा वह गधा होगा । उसी जगह को मगहरपट्टी कहते हैं । आध्यात्मिक दृष्टि से यह माया ही मगहर क्षेत्र है । अतः जो दिनरात भगवान् की त्याग कर माया की ही सेवा में लगे रहेंगे उनकी सद्गति कभी नहीं होगी । जो माया को त्याग कर भगवान् को भजते हैं वे देवस्वरूप होकर मुक्त हो जाते हैं । लिखा है कि- 
अहो ! माया की अद्भुत लीला है कि पत्थर के खण्डों को रत्नबुद्धि से उनका संग्रह करते । मांस और खून से बने स्त्री शरीर को कान्ता नाम से पुकारते हैं । जो शरीर अत्यन्त घृणित है । जो पांच भूतों से बना शरीर है उसमें आत्मबुद्धि कर रहे हैं । इस मोह माया की जय हो, जिसने सभी को भ्रम में डाल रखा है । वेदान्तसंदर्भ में माया पञ्चक में लिखा है कि- इस माया ने सच्चिद् अखण्ड ज्ञानस्वरूप अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप जीव को पंचभूतों से बने हुए इस शरीर में ममता करवाकर इस भवसागर में भ्रमा रही है, क्योंकि यह माया अघटित घटना के करने में बड़ी चतुर है । 
*कालर खेत न नीपजै, जो बाहे सौ बार ।* 
*दादू हाना बीज का, क्या पचि मरै गँवार ॥४९॥* 
ऊषर भूमि में सैकड़ों बार बीज बोने पर भी कुछ फल नहीं मिलता किन्तु बीज ही नष्ट हो जाता है । ऐसे ही अज्ञानी जीव ऊषर भूमि के सदृश मायिक पदार्थों में ही परमानन्द को खोजते हैं । उनको परमानन्द नहीं मिल सकता प्रत्युत बीज की तरह जीवन ही नष्ट हो जायेगा । 
योगवासिष्ठ में कहा है कि- मानो ये भाई बन्धु नदियों की तरह है, जैसे अनन्त नदियाँ समुद्र में गिरकर नष्ट हो जाती । ऐसे ही यह भाई बन्धु भी अनन्त खड्डों वाले कालरुपी महासमुद्र में न जाने कहाँ समा गये । जिन का पता ही नहीं चलता । 
चिरकाल से चिन्ताचक्र में बंधा हुआ तथा पापकर्मों के आचरण में संलग्न यह चित्त, संसारसमुद्र के मध्य गम्भीर आवर्तों में पड़कर तृण की तरह चक्कर काटता हुआ भटकता रहता है । इस चित्र को कार्यरूपी असंख्य तरंगे उछालती रहती हैं । तथा चिन्ता के फेर में पड़कर ताण्डव नृत्य करता है । जिससे इस को क्षणभर की भी विश्रान्ति नहीं मिलती जैसे समुद्र में तृण एक गड्डे से दूसरे गड्डों में घूमता रहता है । हे तात ! यह देहरूपी रत्न विनाशरूपी कीचड़ से परिपूर्ण सागर के गर्भ में न जाने कहां समा गया । 
*दादू इस संसार सौं, निमष न कीजे नेह ।* 
*जामण मरण आवटणा, छिन छिन दाझै देह ॥५०॥* 
इस संसार से अधिक स्नेह नहीं रखना चाहिये । अधिक स्नेह रखने वाले को जन्म मरण रूपी अग्नि में दीपक की तरह जलना पड़ता है । क्योंकि दीपक में स्नेह(तेल) भरा पड़ा है । 
वासिष्ठ में- हे राम ! अन्तःसंग अर्थात् अहंता, ममता और आसक्ति ही संसार में समस्त प्राणियों के जन्म मरण और मोहरूपी वृक्षों का मूल कारण है । जो जीव अहंता ममता आसक्तियों से युक्त है, वह भव सागर में डूबा हुआ है । परन्तु जो इनसे मुक्त हो गया वह संसार से पार पहुँच गया । जो चित्त विषयों की आसक्ति से रहित और निर्मल है वह संसारी होते हुए भी निःसंदेह मुक्त है । जो आसक्ति वाला है, वह सैकड़ों शाखाओं से युक्त वृक्ष की तरह फैला हुआ है । 
(क्रमशः)

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