🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त Ram Gopal तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*३. नांम कौ अंग ~ १४१/१४४*
.
नोमी३ नवए नांम रत, दसमी४ हरि दीदार ।
कहि जगजीवन अमी सबद हरि, नरसिंह न्रिमल सार ॥१४१॥
(३. नोमी-नवमी तिथि) (४. दसमी-दसमी तिथि)
संतजगजीवन जी भ्रम दूर करते हुए तिथि महत्व अपने ढंग से बता रहे हैं कि नवमी तिथि नमन की, हे जीव नाम में रत होकर नमन करें । दशमी दर्शन की, फिर भूखे रहकर व्रत ही नहीं अमृत शब्द “प्रभु नाम ही है” का पान करें जो विकार रहित सार रुप है ।
.
सुरसंधी५ सुमिरन करै, अथ इति अनहद रांम ।
कहि जगजीवन सुकीरति, भाव उच्यते नांम ॥१४२॥
(५. सुरसंधी-स्वरसन्धि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि स्वर संधि स्मरण द्वारा जीव ब्रह्म का मेल करवाती है । हमारे स्वर में प्रभु नाम स्मरण का गुंजन होगा, शब्द प्रभु नाम होगा तभी शब्द व स्वर की संधि से परमात्मा का मिलन होगा।
.
नांम न ले अरु आंन ले, सोई हाथ थैं जाइ ।
कहि जगजीवन रांम धन, बहुरि कहाँ कोइ पाइ ॥१४३॥
जीव प्रभु का नाम लेकर अन्य विषयों में अटका रहे तो सब कुछ हाथ से निकल जाता है । संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे जीव तुम ये राम रुपी धन अगर अब नहीं पा सके तो, कब और कैसे पाओगे क्योंकि इसके लिये प्रयास तो सिर्फ मानव जन्म में ही कर सकते हैं।
.
सूरज ऊगै आंथवै६, इक आनंद इक दुंद ।
कहि जगजीवन हरि भगति, नांम जपै निरदुंद७ ॥१४४॥
(६. आंथवै-अस्त हो) (७. निरदुंद-निर्द्वन्द-निर्विघ्न)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सूर्य उदय होता है तो वह आनंद का विषय है और अस्त होना मानसिक द्वन्द्व का विषय है कि ये लो रात हो गयी अब कार्य कैसे सम्भव होंगे । अतः समय तो आकर जा रहा है, जीव बिना समय गंवाये निर्द्वन्द भाव से हरि स्मरण करें।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें