गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

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*यहु परिख सराफी ऊपली, भीतर की यहु नांहि ।*
*अन्तर की जाणैं नहीं, ता तैं खोटा खांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पारिख का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी​ 
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *स्मरण भक्ति*
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सन्तवर दादूजी राजस्थान प्रान्त में कहीं जा रहे थे । मार्ग में उन्होंने बहुत ऊंचे स्वर में बोलते हुये एक व्यक्ति का बारम्बार यह वचन सुन - "राम आयो रे भाई ! राम आयो ।" तब वे यह सोच कर कि यह कोई भक्त है, उसे रामजी ने दर्शन दिया है, इससे वह हर्ष से पुकार रहा है कि कोई और भी रामजी के दर्शन कर लें वहां गये । आगे जाकर देखा, एक कुंआ चल है उसका चड़स(चमड़े का बड़ा डोल) कुएं के मुख पर आता है तब उसे पकड़ने वाला मनुष्य 'राम आयो रे भाई ! राम आयो' बोल रहा है । यह देखकर दादूजी ने कहा -
"दादू दुनिया बावरी, कहे चाम को राम ।
पूंछ मरोड़े बैल का, काढे अपना काम ॥"
अर्थात दुनियां के लोग अज्ञानी है, चाम के आने को ही राम का आना कहते हैं और चैतन्य जो राम रूप बैल है, उसका पूंछ मरोड़ते हैं । इसलिये ऐसे राम आयो कहने का फल केवल चड़स हाथ में ही आना ही है । रामजी के दर्शन नहीं । इससे सूचित होता है कि जिस कार्य के लिये राम नाम कहा जाता है उससे वही काम होता है ।
राम कहे जिस कारय हित, होता है वह काम ।
जय लखा कर में चड़स, वहां न पाये राम ॥७७॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

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