रविवार, 31 मई 2020

*नित्यसिद्ध तथा कौमार-वैराग्य*

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*अनिल पंखी आकाश को, माया मेरु उलंघ ।* 
*दादू उलटे पंथ चढ, जाइ बिलंबे अंग ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ माया का अंग)* 
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}* 
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ 
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*नित्यसिद्ध तथा कौमार-वैराग्य* 
राखाल के पिता बैठे हुए हैं । राखाल आजकल श्रीरामकृष्ण के पास ही रहते हैं । राखाल की माता के गुजर जाने पर उनके पिता ने अपना दूसरा विवाह कर लिया है । राखाल यहीं रहते हैं; इसलिए उनके पिता कभी कभी आया करते हैं । राखाल के यहाँ रहने में इनकी ओर से कोई बाधा नहीं है । ये श्रीमान् और विषयी मनुष्य हैं । सदा मुकदमों की पैरवी में रहते हैं । श्रीरामकृष्ण के पास कितने ही वकील और डिप्टी मैजिसट्रेट आया करते हैं । राखाल के पिता इनसे वार्तालाप करने के लिए कभी कभी आ जाते हैं । उनसे मुकदमों की बहुत सी बातें सूझ जाती हैं । 
श्रीरामकृष्ण रह-रहकर राखाल के पिता को देख रहे हैं । श्रीरामकृष्ण की इच्छा है, राखाल उन्हीं के पास रह जाएँ । 
श्रीरामकृष्ण(राखाल के पिता और भक्तों से)- अहा, आजकल राखाल का स्वभाव कैसा हुआ है ! उसके मुँह पर दृष्टि डालने से देखोगे, उसके होंठ रह-रहकर हिल रहे हैं । अन्तर में ईश्वर का नाम जपता है, इसलिए होंठ हिलते रहते हैं । 
“ये सब लड़के नित्यसिद्ध की श्रेणी के हैं । ईश्वर का ज्ञान लेकर पैदा हुए हैं । कुछ उम्र होते ही ये समझ जाते हैं कि संसार की छूत देह में लगी तो फिर निस्तार न होगा । वेदों में ‘होमा’ पक्षी की कहानी है । वह चिड़िया आकाश में ही रहती है; जमीन पर कभी नहीं उतरती । आकाश ही में अण्डे देती है । अण्डे गिरते रहते हैं, पर वे इतनी ऊँचाई से गिरते हैं कि गिरते ही गिरते बीच में वे फूट जाते हैं । तब बच्चे निकल आते हैं । वे भी गिरने लगते हैं । उस समय भी वे इतने ऊँचे पर रहते हैं कि गिरते ही गिरते उनके पंख निकल आते हैं और आँखें भी खुल जाती हैं । तब वे समझ जाते हैं कि अरे हम मिट्टी में गिर जाएँगे, और गिरे तो चकनाचूर ! मिट्टी देखते ही एकदम अपनी माता की ओर उड़ जाते हैं । माता के निकट पहुंचना ही उनका लक्ष्य हो जाता है । 
“ये सब लड़के ठीक वैसे ही हैं । बचपन ही में संसार देखकर डर जाते हैं । इनकी एकमात्र चिन्ता यही है कि किस तरह माता के निकट जाएँ, किस प्रकार ईश्वर के दर्शन हों । 
“यदि यह कहो कि ये रहे विषयी मनुष्यों में, पैदा हुए विषयी के यहाँ, फिर इनमें ऐसी भक्ति, ऐसा ज्ञान कैसे हो गया, तो इसका भी अर्थ है । मैली जमीन पर यदि चना गिर जाय, तो उसमें चना ही फलता है । उस चने से कितने अच्छे काम होते हैं । मैली जमीन पर गिर गया है, इसलिए उसमें कोई दूसरा पौधा थोड़े ही होगा । 
“अहा, राखाल का स्वभाव आजकल कैसा हो गया है ! और होगा भी क्यों नहीं । यदि सूरन अच्छा हुआ, तो उसके अंकुर भी अच्छे होते हैं । (सब हँसते हैं) जैसा बाप, वैसा उसका बेटा ।” 
मास्टर(गिरीन्द्र से अलग से)- साकार और निराकार की बात कैसी समझायी इन्होंने ! जान पड़ता है, वैष्णव केवल साकार ही मानते हैं । 
गिरीन्द्र- होगा । वे एक ही भाव पर अड़े रहते हैं । 
मास्टर-‘नित्य साकार’ आप समझे । स्फटिकवाली बात । मैं उसे अच्छी तरह नहीं समझ सका । 
श्रीरामकृष्ण- (मास्टर से)-क्यों जी, तुम लोग क्या बातचीत कर रहे हो । 
मास्टर और गिरीन्द्र जरा हँसकर चुप हो गए । 
वृन्दा दासी(रामलाल से)- रामलाल, अभी इस आदमी को मिठाइयाँ दो, हमें बाद में देना । 
श्रीरामकृष्ण- वृन्दा को अभी मिठाईयाँ नहीं दी गयीं? 
(क्रमशः)

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