रविवार, 31 मई 2020

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*दादू ऐसे महँगे मोल का, एक सांस जे जाइ ।*
*चौदह लोक समान सो, काहे रेत मिलाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु*, *स्मरण भक्ति*
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एक जाट का एक नदी के तट पर खेत था । नदी के बाढ से कुछ भूमी कट गई थी । वहां एक बहुमुल्य रत्नों का पात्र निकला था । जाट उनको पत्थर समझ कर ले आया और उसे पक्षीयों को उड़ाने के लिये फेंकने लगा । वे सब पुन: नदी में जा गिरे । 
एक कंकर को उसका बच्चा घर ले आया था । घर में नमक नहीं होने के कारण जाटनी उसी कंकर को लेकर नमक लाने गई । जब वह दुकान पर खड़ी थी तब वहां एक जौहरी आ गया, उसने उसके हाथ में रत्न देख कहा - "यह तू मुझे दे दे और तुझे जो भी चाहिये लेजा । जाटनी ने जो भी मांगा वही दे दिया और फिर बहुत सा धन भी दिया । 
जाटनी अच्छे - अच्छे पदार्थ और वस्त्र जाट के लिये ले जाने लगी । जाट ने पुछा - 'ये तू कहां से लाती है ? उसने सब बात सत्य सत्य सुना दी । उसकी बात सुनकर तथा घर आकर घर की संपत्ति देखकर जाट हाय ! ऐसे तो मैंने बहुत से खो दिये ।' यह बोलता हुआ मूर्छित होकर गिर पड़ा । इसी प्रकार बिना भजन श्वास रूपी अमूल्य रत्नों को खो देने से अन्त में पश्चाताप के सहित भारी संताप होता है ।
गई आयु जो भजन बिन, तिहिं हो पश्चताप ।
रत्न खोईकर जाट इक, अधिक लहा सन्ताप ॥९९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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