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*दादू ‘मैं’ ही मेरे आसरे, ‘मैं’ मेरे आधार ।*
* मेरे तकिये ‘मैं’ रहूँ, कहै सिरजनहार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ हैरान का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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‘अहं’ जाता नहीं है । ‘बदमाश मैं ।’ ‘दास मैं ।’
“जो ‘मैं’ संसारी बनता है, कामिनी-कांचन में फंसता है, वह बदमाश ‘मैं’ है । जीव और आत्मा में भेद सिर्फ इसलिए है कि बीच में यह ‘मैं’ जुड़ा हुआ है । पानी पर अगर लाठी डाल दी जाए तो पानी दो हिस्सों में बँटा हुआ दीख पड़ता है । परन्तु वास्तव में है वह एक ही पानी; लाठी के कारण उसके दो हिस्से नजर आते हैं ।
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“वह लाठी ‘अहं’ ही है । लाठी उठा लो, वही एक जल रह जायगा ।
“बदमाश ‘मैं’ वह है जो कहता है, ‘मुझे नहीं जानते हो ! मेरे इतने रूपये हैं, क्या मुझसे भी कोई बड़ा आदमी है?’ यदि किसी ने दस रूपये चुरा लिये तो पहले वह चोर से रूपये छीन लेता है, फिर चोर की ऐसी मरम्मत करता है कि पसली ढीली कर देता है; इतने पर भी उसको नहीं छोड़ता, पहरेवाले के हाथ सौंपता है और सजा दिलवाता है ! ‘बदमाश मैं’ कहता है, ‘अरे, इसने मेरे दस रूपये चुराये थे, उफ, इतनी हिम्मत !’
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विजय- यदि बिना ‘अहं’ के दूर हुए सांसारिक भोगों से पिण्ड नहीं छूटने का-समाधि नहीं होने की, तो ज्ञानमार्ग पर आना ही अच्छा है, क्योंकि उसमें समाधि होगी । यदि भक्तियोग में ‘अहं’ रह जाता है तो ज्ञानयोग ही अच्छा ठहरा ।
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श्रीरामकृष्ण- समाधि प्राप्त होकर एक दो मनुष्यों का अहंकार जाता है अवश्य, परन्तु प्रायः नहीं जाता । लाख विचार करो, पर देखना कि ‘अहं’ घूम-घूमकर फिर उपस्थित है । आज बरगद का पेड़ काट डालो, कल सुबह को उसमें अंकुर निकला हुआ ही देखोगे । ऐसी दशा में यदि ‘मैं’ नहीं दूर होने का तो रहने दो साले को ‘दास मैं’ बना हुआ । ‘हे ईश्वर ! तुम प्रभु हो, मैं दास हूँ’ इसी भाव में रहो । ‘मैं दास हूँ’, ‘मैं भक्त हूँ’ ऐसे ‘मैं’ में दोष नहीं । मिठाई खाने से अम्लशूल होता है, पर मिश्री मिठाइयों में नहीं गिनी जाती ।
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“ज्ञानयोग बड़ा कठिन है । देहात्मबुद्धि का नाश हुए बिना ज्ञान नहीं होता । कलियुग में प्राण अन्न्गत है, अतएव देहात्मबुद्धि, अहंबुद्धि नहीं मिटती । इसलिए कलियुग के लिए भक्तियोग है । भक्तिपथ सीधा पथ है । हृदय से व्याकुल होकर उनके नाम का स्मरण करो, उनसे प्रार्थना करो, भगवान् मिलेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं ।
“मानो जलराशि पर बिना बाँस रखे ही एक रेखा खींची गयी है, मानो जल के दो भाग हो गये हैं; परन्तु वह रेखा बड़ी देर तक नहीं रहती । ‘दास मैं’ या ‘भक्त का मैं’ अथवा ‘बालक का मैं’ ये सब ‘मैं’ की रेखाएँ मात्र हैं ।”
(क्रमशः)

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