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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
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*बुद्धि विवेक बल हरणी, त्रय तन ताप उपावनी ।*
*अंग अगनि प्रजालिनी, जीव घरबार नचावनी ॥१०८॥*
यह स्त्रीरूपी माया मनुष्य के शरीर बल को विवेक तथा बुद्धि का हरणकर लेती है । त्रिविध तापों को पैदा करती है । मन में काम को जगाकर कामाग्नि के द्वारा जीव को जलाती रहती है । अधिक क्या कहें विषय भोगों की आशा को पैदा करके जीव को जन्म-जन्मान्तरों में भ्रमाती रहती है । अतः मुमुक्षुओं को स्त्री का साथ त्याग देना चाहिये ।
शिवानन्दलहरी में लिखा है कि- हे शंकर ! मेरा मन रूपी बन्दर मोह रूपी जंगल में स्त्रियों के ऊंचे-ऊंचे कुचरूपी पर्वतों पर आशारूपी शाखाओं पर स्वेच्छा से जल्दी नाचता हुआ दौड़ रहा है । अतः मुझ भिक्षु(मुमुक्षु) के चंचल मन को आप दृढ़भक्ति के द्वारा बांध कर अपने अधीन कर लीजिये ।
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*नाना विधि के रूप धर, सब बांधे भामिनी ।*
*जग बिटंब परलै किया, हरि नाम भुलावनी ॥१०९॥*
भगवान् की यह स्त्रीरूपी माया नाना रूपों से नाना प्राणियों को अपने अधीन करके स्त्री भोग की वासना से नरक में डाल देती है । फिर ये पुरुष स्त्री लम्पट होते हुए इस संसार में भगवान् के भजन को त्यागकर पशु पक्षी योनि में जन्मते मरते रहते हैं । इसलिये भगवान् को भुलाने वाली इस माया को त्याग देना चाहिये ।
भागवत में लिखा है कि- हे राजन् ! अपने इन्द्रियों को वश में न रखने वाला पुरुष जब स्त्री को देखता है तो उसके हावभाव पर मोहित हो जाता है और घोर अन्धकार रूपी नरक में गिर कर अपना विनाश कर लेता है । जो मूढकामिनी कंचन गहने कपड़े आदि नाशवान् मायिक पदार्थों में फंसा हुआ है और चित्तवृत्ति उपभोग के लिये लालायित रहती है वह अपनी विवेक बुद्धि नष्ट कर के पतंगा के समान नष्ट हो जाता है । जो जो प्रिय वस्तुएं हैं उनका संग्रह मनुष्य के लिये दुःखदायी है । जो अकिंचन है वह अत्यन्त सुख को प्राप्त होता है और वह ही विद्वान् माना जाता है ।
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*बाजीगर की पूतली, ज्यौं मर्कट मोह्या ।*
*दादू माया राम की, सब जगत बिगोया ॥११०॥*
जैसे इन्द्रजाल की माया से रचित पुतली, बन्दर को मोहित करके नचाती है और सब को नष्ट कर देती है । वैसे ही भगवान् की माया भी मनुष्य को नचाती है । तथा सब मनुष्यों को नष्ट कर देती है ।
वासिष्ठ में लिखा है कि- जैसे कोई बन्दर वन में एक पेड़ पर बैठकर क्षणभर में ही वन के दूसरे-दूसरे पेड़ों पर दौड़ता रहता है । ऐसे ही यह वासना भी वासना वाले प्राणियों को शरीर त्यागने के बाद दूसरे-दूसरे जन्मों में भटकाती रहती है । यह जीव इतने बड़े देशकाल में अपनी ही वासना से दौड़ रहा है ।
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*॥ सिसन स्वाद ॥*
*मोरा मोरी देखकर, नाचै पंख पसार ।*
*यों दादू घर आंगणै, हम नाचे कै बार ॥१११॥*
जैसे मयूर मयूरी को देखकर भोगवासना से उसके आगे नाचता है । वैसे ही यह जीव कितनी बार मायापति भगवान् के घर के आंगन में(संसार) में नाचता है ।
वासिष्ठ में लिखा है कि- जहां पर चित्तरूपी पक्षी अपने शरीररूपी घौंसले को त्यागकर अपनी वासना से जाता है वहां ही यह जीवात्मा भी पहुंच जाता है ।
(क्रमशः)

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