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*दादू जब लग नैन न देखिये, साध कहैं ते अंग ।*
*तब लग क्यों कर मानिये, साहिब का प्रसंग ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*११७. गुण्टिचा(उद्यान मन्दिर) मार्जन*
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श्रीगुण्टिचामन्दिरमात्मवृन्दै:
सम्मार्जयन् क्षालनत: स गौर:।
स्वचित्तवच्छीतलमुज्ज्वलञ्च
कृष्णोपवेशौपयिकं चकार॥[१]
([१] श्रीगौरांग महाप्रभु ने अपने आत्मीय भक्तों के सहित श्रीगुण्टिचाभवन का मार्जन तथा क्षालन करके उसे अपने शीतल और निर्मल चित्त की भाँति खूब स्वच्छ और पवित्र बनाकर श्रीकृष्ण के बैठने योग्य बना दिया।’ काम क्रोधादि से मलिन हुए मन में श्रीकृष्ण बैठ ही कैसे सकते है? चैतन्य की कृपा हो तो वह वाटिका परिष्कृत हो सकती है। चैत. चरि. म. ली. १२/१)
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संसार में असंख्यों घटनाएं रोज घटित होती हैं। माता से छिपकर मिट्टी प्राय: सभी बच्चे खाते हैं, सभी गोपालों के बालक गौएं चराने जाते हैं और अपने हाथों में दही-भात और टैंटी(कैर) का अचार रखकर वहीं खाते हैं। गोपियों की भाँति न जाने कितनी प्रेमिकाएँ अपने प्रियतमों के लिये रोती रहती होंगी।
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सुदामा के समान धनहीन बहुत से मित्र अपने धनिक मित्रों से मान सम्मान तथा धन पाते होंगे; किन्तु उनका नाम कोई भी नहीं जानता। कारण, उनमें प्रेम की वह पराकाष्ठा नहीं है। भगवान तो प्रेम के सजीव विग्रह थे। प्रेम के संसर्ग होने से ये सभी घटनाएँ अमर हो गयीं और प्रेमी भक्तों के प्रेमवर्धन करने की सर्वोत्तम सामग्री बन गयीं।
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असल में प्रेम ही सत्य है, प्रेमपूर्वक किये जाने वाले सभी काम प्रेम की ही भाँति अजर-अमर और अमिट होते हैं। प्रेम के साथ प्राणों का भी परित्याग करने पड़े तो वह भी सुखकर प्रतीत होता है। अपने प्रेमी के साथ मरने में मीठा मीठा मजा आता है। प्रेम के सामने दु:ख कैसा। सन्ताप का वहाँ नाम नहीं; थकान, आलस्य या विषण्णता का एकदम अभाव होता है।
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यदि एक ही उद्देश्य के एक से ही मनवाले दस बीस पचास प्रेमी बन्धु हों तो फिर बैकुण्ठ के सुख का अनुभव करने के लिये अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं होती। वैकुण्ठ का सुख उनकी संगति में ही मिल जाता है। उनके साथ प्रेमपूर्वक मिलकर जो भी कार्य किया जाता है, वही प्रेममय होने के कारण आनन्दमय और हर्षमय ही होता है।
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महाप्रभु गौड़ीय भक्तों के साथ नित्य नयी नयी क्रीड़ाएँ करते थे। उनका भोजन, भजन, स्नान, संकीर्तन तथा हास-परिहास सभी प्रेममय ही होता था। सभी भक्त क्रमश: नित्य प्रति महाप्रभु को अपने अपने यहाँ भिक्षा कराते। महाप्रभु भी एक-एक दिन में भक्तों की प्रसन्नता के निमित्त तीन तीन, चार-चार स्थानों में थोड़ा-थोड़ा भोजन कर लेते। वे भक्तों को साथ लेकर ही मन्दिर में जाते, उनके साथ ही स्नान करते और सबको पास बिठाकर ही प्रसाद पाते।
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इस प्रकार धीरे धीरे रथयात्रा का समय समीप आने लगा। पंद्रह दिनों तक एकान्त में महालक्ष्मी के साथ एकान्तवास करने पर अनन्तर जगन्नाथ जी के पट खुलने का समय भी सन्निकट ही आ पहुँचा। नेत्रोत्सव के एक दिन पूर्व महाप्रभु ने एक प्रेम कुतूहल करने का निश्चय किया।
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श्रीजगन्नाथ जी के मन्दिर से एक कोस की दूरी पर गुण्टिचा नामका एक उद्यान मन्दिर है। रथ-यात्रा के समय भगवान की सवारी यहीं आकर ठहरती है और एक सप्ताह के लगभग भगवान यहीं निवास करते हैं, फिर लौटकर मन्दिर में आ जाते हैं, इसी का नाम रथ यात्रा है।
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रथ यात्रा के पूर्व नेत्रोत्सव होता है, उस दिन पंद्रह दिनों के पश्चात कमल नयन भगवान के लोगों को दर्शन होते हैं। नेत्रोत्सव के एक दिन पूर्व ही प्रभु ने गुण्टिचा भवन को मार्जन करने का विचार किया। गुण्टिचा उद्यान मन्दिर का आंगन लगभग डेढ़ सौ गज लंबा है। उसमें मूल मन्दिर के अतिरिक्त एक दूसरा नृसिंह भगवान का मन्दिर भी है।
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दोनों लगभग पंद्रह-पंद्रह सोलह-सोलह गज लम्बे चौड़े होंगे। महाप्रभु ने काशी मिश्र तथा सार्वभौम भट्टाचार्य को बुलाकर उन पर अपना मनोगत भाव प्रकट किया। सभी को सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। काशी मिश्र ने कहा- ‘प्रभु ! गुण्टिचा भवन तो साफ होती ही है, उस काम को करके आप क्या करेंगे, आप तो संकीर्तन ही करें।’
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प्रभु ने कहा- ‘मिश्र जी ! आप विद्वान भक्त और जगन्नाथ जी के भक्त होकर ऐसी बात कहते हैं? भगवान की सेवा में कोई भी काम छोटा नहीं है। इन हाथों से भगवान की तुच्छ-से-तुच्छ सेवा का भी सौभाग्य प्राप्त हो सके तो हम अपने जीवन को धन्य समझेंगे। भगवान की सेवा में छोटे-बड़े का ध्यान न आना चाहिये। जो भी काम मिल जाय, उसे ही श्रद्धा-भक्ति के साथ करना चाहिये। हमारी ऐसी इच्छा है, आप जल्दी से इसका प्रबन्ध करें।’
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महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके काशी मिश्र ने उद्यान के मार्जन के निमित्त झाडू, टोकरी तथा और भी आवश्यकीय वस्तुएँ का प्रबन्ध कर दिया। अब महाप्रभु अपने सभी भक्तों के सहित गुण्टिचा मार्जन के लिये चले। सार्वभौम भट्टाचार्य, राय रामानन्द तथा वाणीनाथ जैसे प्रमुख-प्रमुख गण्यमान्य पुरुष भी प्रभु के साथ हाथ में झाडू तथा खुरापियों को लेकर चले।
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सबसे पहले तो महाप्रभु ने वहाँ इधर उधर जमी हुई घास को छिलवाया। फिर आपने सभी भक्तों से कहा- ‘सभी एक-एक झाड़ू ले लीजिये और झाड़कर अपना अपना कूड़ा अलग एकत्रित करते जाइये। कूड़े को देखकर ही सबको पुरस्कार अथवा तिरस्कार मिलेगा।’ बस, इतना सुनते ही सभी भक्त उद्यान साफ करने में जुट गये।
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सभी एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे थे, सभी चाहते थे कि मेरा ही नम्बर सर्वश्रेष्ठ रहे। सभी भक्तों के शरीरों से पसीना बह रहा था। महाप्रभु तो यन्त्र की भाँति काम में लगे हुए थे। उनके गौरवर्ण के अरुण कपोल गर्मी और परिश्रम के कारण और भी अधिक अरुण हो गये थे। उनमें से स्वेद-बिन्दु निकल निकलकर प्रभु के सम्पूर्ण शरीर को भिगो रहे थे।
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महाप्रभु झाड़ू हाथ में लिये कूड़े को इकट्ठा करने में लगे हुए थे। कोई भक्त सफाई करने में प्रमाद करता या सुस्ती दिखाता तो प्रभु उसे मीठा मीठा उलाहना देते। एक पत्ते को भी पड़ा हुआ नहीं देख सकते थे। बीच-बीच में प्रभु भक्तों को प्रोत्साहित भी करते जाते थे। महाप्रभु के प्रोत्साहन को पाकर सभी भक्त दूने उत्साह से काम करने लगते।
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इस प्रकार बात-की-बात में उद्यान तथा मन्दिर का सभी कूड़ा साफ हो गया। सबके कूड़े का महाप्रभु ने भक्तों के साथ निरीक्षण किया। हिसाब लगाने पर महाप्रभु का ही कूड़ा सबसे अधिक निकला और सबसे कम अद्वैताचार्य का। इस पर हंसी होने लगी। महाप्रभु कहने लगे- ‘ये तो भोलेबाबा हैं। इन्हें एकत्रित करने से प्रयोजन ही क्या? ये तो संहारकारी हैं।’ इस पर खूब हंसी हुई। और भी भाँति-भाँति के विनोद होते रहे।
(क्रमशः)

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