गुरुवार, 28 मई 2020

साच का अंग ३४/३८

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*कोई खाइ अघाइ करि, भूखे क्यों भरिये ।*
*खूटी पूगी आन की, आपण क्यों मरिये ॥३४॥*
जो भोजन करेगा उसी की भूख दूर होगी दूसरे की नहीं । तथा जिसका प्रारब्ध कर्म समाप्त होता है उसी की ही मृत्यु होती है । यह नियम सार्वभौम है । इसी प्रकार से जो जैसा कर्म करेगा उसको वैसा ही फल मिलेगा । दूसरे को नहीं । 
महाभारत में- हे कुन्तिनंदन ! मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार भिन्न भिन्न लोकों में जाते हैं । पुण्य कर्म करने वाले पुण्य लोकों में तथा पापाचारी पापमय लोकों में जाते हैं । 
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*फूटी नाव समंद में, सब डूबन लागे ।*
*अपना अपना जीव ले, सब कोई भागे ॥३५॥*
जैसे समुद्र में जहाज के नष्ट होने पर जल से बाहर निकलने के लिये कोई दूसरा, दूसरे को निकालने की चेष्टा नहीं करता, वैसे ही अपनी आत्मा के उद्धार के लिये स्वयं को ही यत्न करना चाहिये । दूसरे की तरफ देखना उचित नहीं । 
गीता में- अपनी आत्मा का उद्धार स्वयं ही करो किसी दूसरे की तरफ मत दखो क्योंकि आपने ही अपनी आत्मा पर कूडा कंकर डाल रखा है । अतः अपने को अवसन्न मत करो, विषादग्रस्त मत करो । आप स्वयं ही अपने शत्रु तथा मित्र हैं ।
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*दादू शिर शिर लागी आपने, कहु कौण बुझावै ।*
*अपना अपना साच दे, सांई को भावै ॥३६॥*
जैसे अपने शिर पर आग के जलने पर सभी लोग पहले अपने शिर की ज्वाला को दूर करते हैं अपना अपना पुण्य दान करके । ऐसे ही सभी प्राणी त्रिविध ताप की अग्नि में जल रहा है । साधक को चाहिये कि साधन जल से अपने त्रिविध ताप को शान्त करे । जो स्वयं अपना उद्धार करता है वह प्रभु को भी प्रिय लगता है ।
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*॥ सुमिरण चितावणी ॥*
*साचा नाम अल्लाह का, सोई सत्य कर जाण ।*
*निश्‍चल कर ले बंदगी, दादू सो परमाण ॥३७॥*
हे साधक ! प्रभु प्राप्ति के लिये केवल इस कलिकाल में एक रामनाम ही सच्चा साधन है । अतः भगवान् के नाम से सच्ची भक्ति करो ।
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*आवट कूटा होत है, अवसर बीता जाइ ।*
*दादू कर ले बंदगी, राखणहार खुदाइ ॥३८॥*
सभी मनुष्यों का हृदय सांसारिक कर्मों से ग्रस्त है । आयु भी प्रतिक्षण नष्ट हो रही है । अतः शीघ्र ही हरि भक्ति के लिये यत्न करना चाहिये । 
महाभारत में- सारा संसार मृत्यु से व्याप्त है और बुढ़ापे ने चारों तरफ से घेर रखा है । दिन रात आते हैं और जाते हैं । फिर भी यह जीव सावधान क्यों नहीं होता । 
(क्रमशः)

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